पत्थर का पुल कर्म-मार्ग है । पत्थर यद्यपि मजबुत होता है, पर उसमें एक बुराई है कि वह बहुत वजनदार होता है, इसलिए डूब जाता है । अतः कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे पत्थर की मजबूती बनी रहे पर वह हल्का हो जाय । और जब इसका उपाय खोजा गया तो पता चला कि नल, नील जिस पत्थर को छू देंगे वह हल्का तो हो जायेगा पर मजबूत ज्यों का त्यों रहेगा । इसी प्रकार हम लोंगो के जीवन में भी सत्कर्म का जो पत्थर है, वह है तो बड़ा मजबूत, पर उसमें अहंकार का बोझ इतना अधिक है कि वह डुबो ही देता है । इसलिए किसी तरह से सत्संग कीजिये, महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त कीजिये कि सत्कर्म हो, पर उसमें अहंकार का बोझ न हो । और निरभिमानी होकर 'रा' और 'म' शब्द लिखकर पत्थरों को परस्पर जोड़ दीजिये । और इस प्रकार जब ईश्वर का आश्रय लेकर व्यक्ति पुल बना लेगा तो सरलता से देहाभिमान के समुद्र को पार कर लेगा, डूबता नहीं ।
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