वर्णन आता है कि चित्रकूट के पास तक निषादराज आगे-आगे चल रहे थे और भरतजी उनके साथ चल रहे थे । पर जिस समय वे चित्रकूट के निकट पहुँचे और श्रीभरत की आँखों से अश्रुधारा उमड़ी तथा गदगद कण्ठ से जब उन्होंने भगवान राम का नाम लेना प्रारंभ किया, तब ऐसा दिव्य प्रेम उमड़ा कि ज्योंही भरत जी के मुख से 'राम' शब्द निकला, गोस्वामीजी ने कहा कि बस, उस शब्द को सुनकर निषादराज की यह दशा हो गयी कि निषादराज जी बेचारे मार्ग भूल गये । इसके द्वारा भगवान ने मानो कहा कि भरत जैसे प्रेमी को मार्ग दिखाने में यही डर है कि मार्ग दिखाने वाला ही कहीं मार्ग न भूल जाय । किसी भक्त ने भगवान से पूछा - महाराज ! अगर मार्ग भूल जायेगा तब तो भटक जायेगा ? किन्तु भगवान ने कहा - नहीं भाई ! यही तो अन्तर है, कि संसार में अगर कोई मार्ग भूल जाय, तो वह प्रेमी भटक कर जिधर जाता है, मैं भी उधर ही चला जाता हूँ । प्रेमी के लिए कोई मार्ग निर्धारित नहीं होता, बल्कि प्रेमी जिधर चला जाता है वही मार्ग बन जाता है । और श्रीभरत जी तो मूर्तिमान प्रेम हैं ।
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