सुमन्त जी ने जब महाराज श्रीदशरथ का प्रस्ताव दुहराया तो उस समय जो सूत्र श्रीसीताजी ने दिया, वह बड़े काम का है । उन्होंने जो बात कही, वह सबके लिए है । श्रीसीताजी ने सुमन्त जी को प्रणाम करके कहा कि आप तो मेरे लिए बड़े पूज्य हैं, मैं आपके सामने उत्तर देना नहीं चाहती हूँ, लेकिन आप जाकर के पिताजी से कह दीजियेगा कि वे मेरे लिए चिन्ता न करें । उस समय श्रीसीताजी ने चिन्ता न करने के लिए तीन सूत्र दिये हैं । वे तीनों सूत्र व्यक्ति के जीवन पथ में आने वाली समस्याओं से संबंधित हैं । उन्होंने कहा कि जीवन पथ पर चलते हुए व्यक्ति के समक्ष बहुधा श्रम, भ्रम और दुख की समस्याएँ आती हुई दिखायी देती हैं । भ्रम की समस्या का तात्पर्य है कि कभी-कभी व्यक्ति के लिए यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि जीवन के लिए सही मार्ग कौन सा है ? इसको कहते हैं बुद्धि का भ्रम । और दूसरी समस्या व्यक्ति के सामने थकान की आती है, क्योंकि जब व्यक्ति चलेगा तो श्रम की अनुभूति तो होगी ही । बुद्धि में भ्रम, शरीर में श्रम और जब बहुत प्रयत्न करने के बाद भी व्यक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं मिलता है तो व्यक्ति के मन में दुख होता है । इस प्रकार ये तीन समस्याएँ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में विद्यमान रहती हैं ।
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