भगवान श्रीराम के द्वारा धनुष तोड़ने पर जनकपुर-वासिनी स्त्रियाँ दूसरा ही अर्थ लेती हैं । उन्होंने तो भगवान राम से ही कह दिया कि राघवेन्द्र ! तुम यह गर्व मत करना कि धनुष को तुमने तोड़ा है । लक्ष्मण जी ने पूछ दिया - प्रभु ने नहीं तोड़ा तो फिर किसने तोड़ दिया ? सखियों ने व्यंग्य भरी भाषा में यही कहा कि जिसे फूल तोड़ने में पसीना आ जाय, वह भला धनुष को तोड़ सकता है ? अरे ! यह तो हमारी तथा श्रीसीताजी की कृपा थी कि हम लोगों ने देवताओं से प्रार्थना करके धनुष को तुड़वा दिया । इसलिए धन्यवाद तो हम लोगों को दीजिए । प्रभु ने मुस्कराकर कहा - बिल्कुल ठीक है । भगवान कहते हैं कि वस्तुतः जो कुछ भी मेरे द्वारा होता हुआ दिखायी देता है वह भक्ति की इच्छा और संकल्प से ही होता है । वस्तुतः भक्ति के बल से ही मैं सारे कार्य सम्पन्न करता हूँ ।
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