वन यात्रा में गंगा पार करने के बाद श्रीसीताजी ने भगवान राम की ओर जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखकर प्रश्न किया - प्रभु आपने तो कहा था कि वन में चलकर एक कुटी बनायेंगे, किन्तु वह वन कितनी दूर है जहाँ आप कुटी बनाने वाले हैं । प्रभु ने कहा - सीते ! लगता है आप थक गयी हैं । इसलिए मैं तो पहले ही कह रहा था कि आप मत चलिए । श्रीसीताजी ने कहा - महाराज ! मुझे अपनी थकान की चिन्ता नहीं है, पर मुझे लगता है कि आप जरुर थक गये होंगे । भगवान राम ने कहा - ऐसा अनुभव तुम्हें क्यों हो रहा है ? तो जनकनन्दिनी श्रीसीता ने कहा - प्रभु ! मुझे आपकी कोमलता का परिचय मिल चुका है । भगवान ने जानना चाहा कि आपको मेरी कोमलता का परिचय कहाँ मिला ? जनकनन्दिनी श्रीसीता ने स्मरण दिलाते हुए कहा - महाराज ! पुष्पवाटिका में आप फूल चुनने आये, उस समय सखी के कहने पर जब मैंने आँखें खोलकर दर्शन किया तो मुझे दिखायी पड़ा कि आपके माथे पर पसीने की बूँद है । - बस महाराज ! मैं उसी समय समझ गयी कि आप अत्यंत सुकुमार हैं क्योंकि जिसे फूल तोड़ने में पसीना आ गया वह कितना कोमल होगा ? पर श्रीराम की यही परिपूर्णता है । वे फूल तोड़ने के कार्य को बड़ी कोमलता से करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि मानो पुष्प की कलियों को वृक्ष से अलग करने में उनका ह्रदय यह सोचकर अत्यंत व्याकुल हो जाता है कि इन पुष्पों को डाली से अलग कैसे करें ? यह जो प्रभु की कोमलता है वह शरीरजन्य नहीं, अपितु भावनाजन्य है ।
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