Tuesday, 9 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम ने महर्षि भरद्वाज से प्रार्थना की कि मुझे मार्ग दिखाने वाला दीजिए । तो इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि जब हम जीवन पथ का चुनाव करें तो अपनी ही बुद्धि से न करें । क्योंकि अपनी बुद्धि और अपने अहंकार से यदि करेंगे तो पता नहीं जो मार्ग चुनेंगे वह उच्छृंखलता और पतन की ओर हमें ले जायेगा कि उत्थान की ओर, इसकी चिन्ता बनी रहेगी । इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वेदानुगामी जीवन व्यतीत करें । अपने जीवन को वेद और शास्त्रों के अनुरूप चलाने की चेष्टा करें । पर भगवान कहते हैं कि इनकी भी एक सीमा है । और सीमा भगवती यमुना हैं । इसलिए इस पार से तो विद्यार्थियों को विदा किया और पार होकर प्रभु चले ।

No comments:

Post a Comment