बहुधा यह देखा जाता है कि जीवन पथ में कुछ लोग अटक जाते हैं, और कुछ लोग भटक जाते हैं । श्रीसीता जी को आप चाहे मूर्तिमान भक्ति कह लीजिए, चाहे शान्ति कह लीजिए, चाहे माया कहिये और चाहे शक्ति कह लीजिए, पर बन्दरों के समान ही सीताजी की खोज में सारे संसार के लोग लगे हुए हैं । यद्यपि कुछ लोग तो रावण की तरह श्रीसीता जी को गलत पद्धति से प्राप्ति किये हुए दिखायी देते हैं । उन्हें लगता है कि सीता जी को हमने पा लिया है । पर यह सर्वनाश की पद्धति है । किन्तु दूसरी ओर रामचरितमानस में यह पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है कि सही पद्धति अपनाने के बाद, इतनी लम्बी यात्रा करने के पश्चात भी बन्दर बेचारे समुद्र के किनारे ही अटक गये । जो श्रेष्ठ लोग हैं, उनमें से भी अधिकांश समुद्र के किनारे जाकर ही अटक जाते हैं । पर अटकने वालों के लिए भी अन्त में यह उपाय निकला कि हनुमान जी लंका से लौटकर अपना अनुभव उन्हें सुनाते हैं । इसका सीधा सा तात्पर्य है कि अगर आप स्वयं चल सकें तो चलिए, पर अगर बीच में थककर अटक गये हों, तो हनुमान जी से कथा जरूर सुनिये । क्योंकि हनुमान जी से कथा सुनकर ही बन्दरों में उत्साह जाग्रत हुआ कि कोई बात नहीं, एक बार यदि अटक गये हैं, तो फिर पार होंगे । इसलिए सारे बन्दर पहले तो लौट आते हैं और नये सिरे से पुनः भगवान के साथ यात्रा करते हुए फिर समुद्र के किनारे आते हैं । किन्तु भई ! समुद्र को पार किये बिना लंका में जाने को नहीं मिलेगा । और लंका में जाये बिना श्रीसीता जी की प्राप्ति नहीं होगी ।
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