तुलसीदास जी जब धनुष-यज्ञ का वर्णन करने लगे तो किसी ने पूछ दिया - महाराज ! श्रीराम को जब पुष्पवाटिका में फूल तोड़ने में पसीना आ गया तो फिर धनुष तोड़ने में उनकी क्या दशा हुई होगी ? तो गोस्वामीजी ने कहा - उस दिन न तो किसी ने श्रीराम को धनुष उठाते देखा, न चढ़ाते देखा और न तोड़ते देखा । लोगों ने देखा कि धनुष टूटा पड़ा है, और उसके पास श्रीराम खड़े हैं । राजागण आश्चर्य से देखने लगे कि कुछ पसीना-वसीना तो आया नहीं, इसलिए वे लोग कहने लगे कि यह तो कोई षड्यंत्र लग रहा है । अरे ! इतना बड़ा धनुष यदि सचमुच तोड़ा होता तो कम से कम पसीना तो आया ही होता । किन्तु भगवान श्रीराघवेन्द्र के कार्य करने की यह सर्वथा अनोखी पद्धति है । उनका अभिप्राय क्या है ? आइए, इस पर भी थोड़ा विचार करें - सुमन सुन्दर मन का प्रतीक है, और धनुष है अहंकार का प्रतीक । जब भगवान को सुमन को डाली से अलग करना पड़ा तो व्याकुल हो गये लेकिन जब अहंकार तोड़ना पड़ा तो रंचमात्र श्रम की अनुभूति नहीं हुई । क्योंकि ईश्वर के आगे अहंकार टिक नहीं सकता, इसका तात्पर्य यह है ।
No comments:
Post a Comment