Saturday, 20 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

जीवनपथ में सर्वदा फूल ही बिछे हुए नहीं मिलते हैं । जनकनन्दिनी श्रीसीता जहाँ प्रकट हुई थी, वहाँ पर तो पुष्प की वर्षा करके श्रीराघवेन्द्र के मार्ग को कोमल बनाया गया था और उस सुकोमल मार्ग पर श्रीराघवेन्द्र चले । पर यह जो चित्रकूट का मार्ग है, पुष्पाच्छादित नहीं है, बल्कि इस मार्ग में तो काँटे ही काँटे बिछे हुए हैं । और भई ! जो सत्य यहाँ प्रभु के जीवन में प्रकट हुआ वही हमारे और आपके जीवन का भी सत्य है । कभी हमारे और आपके जीवन में ऐसा लगता है कि मार्ग पर चलना अत्यंत सुगम है, फूल बिछे हुए हैं तथा स्वागत-सत्कार हो रहा है । और कभी ऐसा प्रतीत होता है कि पग-पग पर काँटे हैं, विध्न हैं । इस प्रकार से रास्ते पर परस्पर दो विरोधी अनुभूतियाँ हों तो क्या काँटों के भय से हम मार्ग पर चलना बन्द कर दें ? क्या कठिनाइयों के भय से हम लक्ष्य की ओर बढ़ने से विरत हो जायँ ? या फिर लक्ष्य की ओर बढ़ने पर आने वाले इन विध्न और काँटों को कैसे पार करें इसका उपाय खोजें ?

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