भगवान राम यमुना पार होकर जब चले तो वहाँ पर एक बड़ा सुन्दर प्रसंग आता है । गोस्वामीजी कहते हैं कि जैसे ही प्रभु ने यमुना पार की, लोगों को दिखायी पड़ा कि एक बड़ा ही तेजस्वी, तपस्वी, भगवान राम के सामने आया । और उसने भगवान राम के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और तब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने गदगद होकर, तापस को कसकर ह्रदय से लगा लिया । कई लोग आज भी प्रश्न करते हैं कि ये तापस जी कौन थे ? और यही प्रश्न गोस्वामीजी से भी लोगों ने पूछा कि महाराज ! बताइए ये कौन हैं ? इसका उत्तर देते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि तापस जी मूर्तिमान प्रेम हैं और भगवान मूर्तिमान परमार्थ । वस्तुतः यह तापस जी और श्रीराम का मिलन नहीं है बल्कि यह तो प्रेम और परमार्थ का मिलन है । भगवान ने जब तापस जी को ह्रदय से लगाया, तो तापस जी से कहा कि मैं तो दरिद्र हूँ और तुम पारस हो । तापस जी ने कहा - महाराज ! आप कैसी बातें करते हैं ? भगवान श्रीराम ने मुस्कराकर कहा - *ब्रह्म दरिद्र है और प्रेम पारस है ।* और यह बिल्कुल ठीक बात है । क्योंकि दरिद्र वह है जो दूसरे की कोई सहायता न कर सके । और भगवान कहते हैं कि मैं तो सारे संसार के ह्रदय में बैठा हुआ हूँ, पर आज तक किसी को बदल नहीं पाया । इसलिए मैं तो दरिद्र हूँ । परन्तु प्रेम का पारस जब जीवन में आ जाता है, तो वह व्यक्ति को बदल देता है, इसलिए पारस तो आप हैं । इसका अभिप्राय है कि ईश्वर के होते हुए भी प्रेम जब तक नहीं आयेगा, तब तक हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं होगा ।
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