जनकनन्दिनी श्रीसीता ने भगवान राम को वन मार्ग में याद दिलाते हुए कहा कि आप अत्यंत सुकुमार हैं, इसलिए जल्दी से वन में कुटिया बनाने का प्रबंध कीजिए । प्रभु ने लौट करके देखा तो दिखायी पड़ा कि श्री सीताजी के होंठ सूख गये हैं, चेहरे पर श्रम की अभिव्यक्ति है । लेकिन सीताजी को अपने श्रम की चिन्ता नहीं है । और भई ! सचमुच जीवन पथ में चलने के लिये यह बहुत बढ़िया सूत्र है । क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रम की चिन्ता करने लगता है तभी समस्या उत्पन्न हो जाती है । हम लोग अपने दुख और श्रम की चिन्ता करते हैं पर चिन्ता करनी चाहिए अपने साथ वाले के श्रम की । अगर हम सामने वाले के दुख से दुखी हों, सामने वाले के श्रम से चिन्तित हों, तो अपना मार्ग जन्य श्रम कम हो जायेगा, विस्मृत हो जायेगा । श्रीसीताजी को चिन्ता है श्रीराम के श्रम की और भगवान श्रीराम तो श्रीसीताजी को श्रमित देखकर रोने लगे ।
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