Tuesday, 16 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में वर्णन आता है कि समुद्र पर पहले पत्थरों का पुल बनाया गया । यह पत्थरों का पुल कर्म मार्ग है । और जब पुल बन गया तो जाम्बवान जी से प्रभु ने पूछा कि अब तो समुद्र पार करने की समस्या समाप्त हो गयी । किन्तु जाम्बवान जी ने कहा - महाराज ! पुल छोटा है, और सेना बड़ी है, इसलिए सारी सेना को पार होने में बड़ा समय लगेगा । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कहा - अच्छा अब एक और पुल मैं बनाता हूँ । और तब प्रभु पुल के ऊपर खड़े हो गये । उस समय प्रभु की रुप-माधुरी का पान करने के लिए जब समुद्र के सारे जलचर ऊपर आ गये तब भगवान राम ने कहा कि अब तो चारों ओर मार्ग ही मार्ग है जो जिधर से जाना चाहे चला जाय । किन्तु बन्दर पहले डरे, उन्हें लगा कि कहीं ऐसा न हो कि हम इन पर चढ़े और ये हमें लेकर ही समुद्र में डूब जायें, इसलिए बन्दरों ने पत्थर आदि फेंककर देखा और जब उन्हें यह लगा कि जलचर डूबने वाले नहीं हैं, तो सेना पार होने लगी । गोस्वामीजी ने लिखा कि कुछ लोग हनुमान जी की तरह आकाश मार्ग से गये । कुछ पत्थर के पुल से गये और कुछ जलचरों के पुल से गये । इस प्रकार तीन मार्गों से सेना पार हुई । मानो भगवान ने बता दिया कि ज्ञान, कर्म और भक्ति इन तीनों ही मार्गों के द्वारा व्यक्ति पार हो सकता है ।

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