Tuesday, 4 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी समुद्र पार करने के लिए जब निकले तो मैनाक पर्वत के बाद सुरसा सामने आ जाती है । सुरसा अपनी भूखी होने की बात कहती है और हनुमानजी की प्रशंसा करते हुए कहती है कि तुम तो शरीर के मोह और बन्धन से ऊपर उठे हुए हो, तुम बहुत बड़े त्यागी और विरागी हो, अतः अपने शरीर को मुझे भोजन के रूप में दे सकते हो जिससे मेरी भूख मिट जाएगी । संसार में देखा जाता है कि बड़े-से-बड़ा त्याग करने वाला व्यक्ति भी अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है । प्रशंसा एक ऐसी वस्तु है जो सबको अच्छी लगती है । प्रशंसा से कौन प्रसन्न नहीं होता ? प्रशंसा बड़े-बड़े व्यक्तियों को लुभाती है । सुरसा हनुमानजी की प्रशंसा करती है पर वे इसके आकर्षण में नहीं फंसते । उन्होंने सुरसा से स्पष्ट रूप से कह दिया कि मेरे सामने एक लक्ष्य है और इस शरीर के द्वारा उसे पूरा करने के बाद ही इसे तुम्हारे भोजन के निमित्त प्रदान कर पाना संभव हो पाएगा, उससे पूर्व नहीं । हनुमानजी का तात्पर्य यह था कि 'हमें शरीर एक उद्देश्य पूर्ति के लिए मिला हुआ है, अतः उस लक्ष्य को पूरा करने तक हमें शरीर को बचाना चाहिए । और जब वह लक्ष्य प्राप्त हो जाय, उस शरीर का सदुपयोग हो जाय तो उसके बाद मृत्यु का स्वागत करने में हमें भयभीत नहीं होना चाहिए ।' यही सच्चे वैराग्यवान का लक्षण भी कहा जा सकता है । वैराग्य का यह अर्थ नहीं है कि प्रशंसा सुनकर अथवा क्षणिक आवेश में आकर शरीर को नष्ट कर दिया जाय । जो विषपान कर अथवा आत्महत्या के द्वारा शरीर को नष्ट कर लेते हैं वे वैराग्यवान नहीं कहे जाते । यह कार्य तो व्यक्ति के आवेश और अज्ञानता का परिचायक है, वैराग्य का नहीं ।

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