Tuesday, 18 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

इन्द्र की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु वामन के रूप में अवतार लेते हैं । बलि ने सारे संसार को जीत लेने के बाद एक महान यज्ञ का आयोजन किया । उस यज्ञ में भगवान वामन एक याचक के रूप में पधारते हैं । उनकी तेजस्विता से बलि प्रभावित हो जाता है । वह उनसे कहता है कि आपके आगमन से हमारा यज्ञ धन्य हो गया । आप आज्ञा दीजिए कि हम आपकी क्या सेवा करें ! बलि के समीप ही शुक्राचार्यजी बैठे हुए थे । उन्होंने भगवान वामन को पहिचान लिया कि ब्रह्मचारी के रूप में साक्षात भगवान विष्णु ही आए हुए हैं । शुक्राचार्य ने बलि को संकेत से कहा कि तुम बाहर चलो, तुमसे एकांत में कुछ बातें करनी है । वे बलि को यज्ञशाला से बाहर ले गए और पूछा - तुम जानते हो यह ब्रह्मचारी कौन हैं ? बलि ने कहा - कोई बहुत बड़े तेजस्वी महापुरुष लगते हैं । शुक्राचार्य बोले - ये कोई ब्रह्मचारी नहीं हैं, स्वयं भगवान विष्णु ही वामन का रूप बनाकर तुम्हारी सारी सम्पत्ति और राज्य को लेने के लिए आए हुए हैं । तुमने बिना जाने-समझे उनको माँगने का वचन देकर ठीक नहीं किया । अतः अब लौटकर उनसे कह दो कि मैं आपको दान नहीं दूँगा । बलि का जन्म यद्यपि दैत्य जाति में हुआ था और उसमें दैत्यों के संस्कार भी थे, पर उस समय उसमें भक्त प्रह्लाद जैसी भावना का उदय हुआ । आप जानते ही होंगे कि बलि के पिता विरोचन और विरोचन के पिता भक्त प्रह्लाद थे । प्रह्लाद-पौत्र बलि ने शुक्राचार्य की बात सुनी तो वह गदगद हो गया । उसने कहा - गुरुदेव ! आप धन्य हैं । आपने ईश्वर को पहिचान लिया और अपने शिष्य को उनका साक्षात्कार करा दिया । आप जैसा गुरु पाकर आज मैं धन्य हो गया ।
     .....शेष कल....

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