Saturday, 22 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

समुद्र-मंथन से जब विष निकला और भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाते हुए कहा कि घबराओ मत ! अमृत निकलने के पहले विष भी निकलता है । तुम धैर्य रखो, अमृत भी अवश्य निकलेगा । तब देवताओं ने कहा - महाराज ! इस विष की ज्वाला से हम सब लोगों की मृत्यु के पश्चात यदि अमृत निकलेगा भी, तो वह किस काम का ? भगवान विष्णु ने कहा कि तुम लोगों में से यदि कोई इसे पी ले तो इस विष की ज्वाला से सबको मुक्ति मिल जायेगी । पर देवता पीछे हट गए । जीवन में दुख कौन स्वीकार करना चाहेगा ? तब भगवान विष्णु ने देवताओं से कहा कि तुम लोग जाकर भगवान शंकर से प्रार्थना करो कि वे इस विष को पी लें । भगवान शंकर उस समुद्र-मंथन में सम्मिलित नहीं थे । भगवान शंकर की दृष्टि सर्वथा भिन्न है । भगवान शंकर ने जब देवताओं से यह सुना कि इसे भगवान विष्णु ने भेजा है तो वे गदगद हो गए - मुझसे वे कितना प्रेम करते हैं ! वे स्वयं विषपान करने में समर्थ हैं । वे चाहते तो इसे नष्ट भी कर सकते थे । पर उन्होंने इसे मेरी महिमा बढ़ाने के लिए ही मेरे पास भेजा है । और भगवान विष्णु जिस वस्तु को भेजेंगे वह तो विष  (मारक) हो ही नहीं सकती, वह वस्तु तो परम कल्याणकारी ही होगी । भगवान शंकर की यह वृत्ति यदि जीवन में आ जाय तो वह जीवन सार्थक और धन्य हो जायेगा । इस कथा का यही सूत्र है ।

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