Friday, 14 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

पुराणों में यह गाथा आती है कि देवता और दैत्य दोनों के ह्रदय में अमृत पाने की इच्छा उत्पन्न हुई । देवता और असुरों का संग्राम चलता रहता था जिसमें दैत्य और देवता दोनों ही मारे जाते थे । पर दैत्यों के गुरु शुक्राचार्यजी को मृतसंजीवनी विद्या का ज्ञान था, इससे दैत्यों को तो जीवनदान मिल जाता था पर देवताओं की संख्या घटती जाती थी । अपनी संख्या अधिक होने के कारण दैत्य आसानी से देवताओं पर विजय प्राप्त कर लेते थे । इसलिए देवताओं को अमृत की आवश्यकता थी क्योंकि वे अमरत्व को प्राप्त कर सकें । देव-दैत्य संघर्ष और उसमें देवताओं की मृत्यु एवं पराजय की यह गाथा वस्तुतः हमारे-आपके जीवन का भी सत्य है । गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में यह दिखाई देता है । हमारे जीवन में जो सद्गुण हैं वे तो मानो देवता हैं और हमारे अन्तःकरण में उत्पन्न होने वाले दुर्गुण-दुर्विचार ही मानो दैत्य हैं । हम सब यह अनुभव करते हैं कि हम अच्छे संकल्प लेते हैं, पर वे श्रेष्ठ विचार पूरे नहीं हो पाते । मानो यही, प्रतीकात्मक रूप से, देवता की मृत्यु है । दूसरी ओर दुर्गुण-दुर्विचार बार-बार हमारे भीतर उत्पन्न होते रहते हैं । इन दोनों के संबंध में पुराणों में जो सूत्र प्राप्त होते हैं वे बड़े महत्व के हैं ।

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