एक व्यक्ति यह मानता है कि हमें जो योग्यताएं प्राप्त हैं उनका उपयोग हमें अधिक से अधिक भोगों के अर्जन में करना चाहिए । वह अपनी क्षमता का उपयोग सांसारिक सुख और भौतिक उन्नति की प्राप्ति के लिए करता है । पर एक दूसरा दृष्टिकोण भी सामने आता है कि जिसमें व्यक्ति यह सोचता है कि 'शरीर के सांसारिक वस्तुओं की आवश्यकता तो है, पर ये वस्तुएँ ही जीवन का लक्ष्य नही हैं ।' उसे ऐसा लगता है कि इस नाशवान शरीर के लिए भोगों को जुटाने में ही हम सारा जीवन व्यतीत कर दें और इस नश्वर शरीर के अन्तराल में जो अविनाशी चैतन्य आत्मतत्व विद्यमान है उसे भूल जायँ, इससे बढ़कर मनुष्य के विवेक का कोई अनादर नहीं होगा । समाज के इन दो रूपों में मानो हम शुक्राचार्य और बृहस्पति के प्रभाव का ही दर्शन करते हैं ।
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