.....कल से आगे....
बलि ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की । पर उसने साथ ही यह भी कहा - गुरुदेव ! आप कह रहे हैं कि वे ईश्वर हैं, तब तो वे सर्वशक्तिमान हैं, चाहे जो कर सकते हैं । वे यदि चाहते तो बलपूर्वक भी मेरा यह राज्य छीन सकते थे । पर उनकी यह कितनी बड़ी कृपा है कि वे एक याचक के रूप में आकर उसे लेना चाहते हैं । यह तो मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है । अतः मैंने निश्चय किया है कि मैं अपने दिए गए वचन पर दृढ़ रहकर, वे जो कुछ भी मांगेंगे, उन्हें सब समर्पित कर दूँगा । शुक्राचार्यजी बलि को ऐसा करने से रोकते हैं । वे क्यों रोकते हैं ? वे तो इतने ज्ञानवान गुरु हैं कि ईश्वर को पहिचान गए । पर ईश्वर को पहिचानने के बाद भी वे बलि को समर्पण से रोकना चाहते हैं, जबकि शास्त्रों में यह लिखा हुआ है कि भगवान को पहचान लेने के बाद यज्ञ, कर्म आदि सब कुछ उन्हें समर्पित कर देना चाहिए, यही जीवन की धन्यता है । यहाँ बलि का सौभाग्य देखिए कि भगवान स्वयं समर्पण कराने के लिए आए हुए हैं । पर शुक्राचार्य सोचते हैं कि इस दान से शिष्य की सारी सम्पत्ति चली जाएगी तो मुझे जो सुख-सुविधा मिली हुई है, वह भी छिन जाएगी । भोग की यही लालसा जो उनमें विद्यमान है, वही बलि को समर्पण से रोकना चाहती है ।
बलि ने गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की । पर उसने साथ ही यह भी कहा - गुरुदेव ! आप कह रहे हैं कि वे ईश्वर हैं, तब तो वे सर्वशक्तिमान हैं, चाहे जो कर सकते हैं । वे यदि चाहते तो बलपूर्वक भी मेरा यह राज्य छीन सकते थे । पर उनकी यह कितनी बड़ी कृपा है कि वे एक याचक के रूप में आकर उसे लेना चाहते हैं । यह तो मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है । अतः मैंने निश्चय किया है कि मैं अपने दिए गए वचन पर दृढ़ रहकर, वे जो कुछ भी मांगेंगे, उन्हें सब समर्पित कर दूँगा । शुक्राचार्यजी बलि को ऐसा करने से रोकते हैं । वे क्यों रोकते हैं ? वे तो इतने ज्ञानवान गुरु हैं कि ईश्वर को पहिचान गए । पर ईश्वर को पहिचानने के बाद भी वे बलि को समर्पण से रोकना चाहते हैं, जबकि शास्त्रों में यह लिखा हुआ है कि भगवान को पहचान लेने के बाद यज्ञ, कर्म आदि सब कुछ उन्हें समर्पित कर देना चाहिए, यही जीवन की धन्यता है । यहाँ बलि का सौभाग्य देखिए कि भगवान स्वयं समर्पण कराने के लिए आए हुए हैं । पर शुक्राचार्य सोचते हैं कि इस दान से शिष्य की सारी सम्पत्ति चली जाएगी तो मुझे जो सुख-सुविधा मिली हुई है, वह भी छिन जाएगी । भोग की यही लालसा जो उनमें विद्यमान है, वही बलि को समर्पण से रोकना चाहती है ।
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