Saturday, 15 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

दैत्यों के गुरु हैं शुक्राचार्य और देवताओं के गुरु हैं बृहस्पति । ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों के स्वभाव का जो वर्णन प्राप्त होता है उसमें कहा गया है कि बृहस्पति में ज्ञान और विचार की प्रधानता रहती है । बृहस्पति के प्रभाव से ही व्यक्ति शास्त्र, वेदान्त आदि का अध्ययन करता है तथा उपासना-साधना आदि की दिशा में प्रवृत्त होता है । शुक्राचार्य भी विद्वता में बृहस्पति से किसी प्रकार न्यून नहीं हैं, पर दोनों की चिन्तन की दिशा में अन्तर है । आप जानते ही होंगे कि जब शुक्र अस्त हो गया हो तो उस स्थिति में ज्योतिषविद् विवाह-कार्य का निषेध करते हैं । 'शुक्रास्त होने पर कन्या को पति के घर नहीं जाना चाहिए', ऐसा कहा जाता है । इसका संकेत यही है कि जीवन में भोगजनित सुखों का प्रेरक और रक्षक शुक्र ही है । दूसरी ओर जीवन में आत्मतत्व को जानने की आकांक्षा और उसे पाने की प्रेरणा के मूल में बृहस्पति ही है । इस प्रकार बृहस्पति और शुक्र दोनों ही विद्वता में समान हैं पर उन दोनों से प्रेरित समाज और व्यक्ति के जीवन में एक बहुत बड़ा अन्तर हमें दिखाई देता है ।

No comments:

Post a Comment