Friday, 7 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी के लंका प्रवेश के समय मुक्के के प्रहार से लंकिनी को एक नई दृष्टि मिली । उठकर खड़ी होने के पश्चात उसने हनुमानजी से कहा - मैं बहुत पुण्यवती हूँ कि मुझे आपके दर्शन करने का सुयोग प्राप्त हुआ । आश्चर्य होता है कि मुक्का पड़ा, गिर पड़ी, रक्त निकलने लगा और कह रही है कि मेरा बहुत बड़ा पुण्य है ! साधारणतया तो यही देखा जाता है कि किसी को चोट लग जाय तो वह यही पूछता है कि यह संकट कैसे आया ? कौन-सी दशा और अन्तर्दशा चल रही है ? पर लंकिनी हनुमानजी के इस प्रहार को अपने किसी पाप का परिणाम न मानकर, पुण्य का परिणाम मानती है और बड़ी प्रसन्न होती है । अच्छी घटना के बाद प्रसन्न होना और इसे अपने पुण्य-फल के रूप में स्वीकार करना, यह तो व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है, पर प्रतिकूलता और आघात के बाद भी उसे अपने पुण्यफल के रूप में ग्रहण कर प्रसन्नता की अनुभूति होना यह एक नई दृष्टि है । पूछा जा सकता है कि हमारे-आपके जीवन में दुख आता है, विपत्ति आती है, वह हमारे पाप का परिणाम है या पुण्य का परिणाम है ? इसका एक ही उत्तर है कि संकट के समय यदि हमारी शुद्ध हुई, हमारा विवेक जागृत हो गया तब वह संकट पाप का नहीं हमारे पुण्य का परिणाम है । और यदि संकट आने पर हमारी बुद्धि और भी मलिन होती गई, तो मानो वह संकट हमारे पाप का परिणाम है ।

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