Thursday, 6 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

प्रसंग आता है कि हनुमानजी जब लंका में पैठने लगे तो अचानक लंकिनी नाम की राक्षसी ने उनका मार्ग रोक लिया । बड़ी अनोखी बात है कि लंकिनी की आँख इतनी पैनी थी कि हनुमानजी के 'अति लघु रूप' में होने पर भी उसने उन्हें देख लिया । लंका वालों की दृष्टि बड़ी पैनी होती है, पर विडम्बना यह है कि वे उस पैनी दृष्टि का उपयोग दूसरों के दोष-दर्शन में ही करते हैं । लंकिनी ने हनुमानजी को पकड़ लिया और कहा - " कहाँ जा रहे हो ? मैं यहाँ इसलिए खड़ी हूँ कि तुम्हारे जैसों को खा सकूँ ! मैं तुम्हें खाऊँगी ।" लंकिनी अपने 'खाने' को एक दार्शनिक रूप देती कहती है कि मैंने निश्चय किया है कि मैं चोरों को मिटाकर रहूँगी, तुम चोर हो अतः मैं तुम्हें खाऊँगी । हनुमानजी ने उनकी बात सुनी और एक मुक्का उसके सिर पर मारा । इस मुष्टि-प्रहार से वह गिर पड़ी पर दूसरे ही क्षण अपने आपको संभालकर खड़ी हो गई । इसमें सूत्र तो यह है कि मनुष्य के जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब उसे आघात लगता है और वह गिर पड़ता है । पर गिर जाने पर भी जो अपने आपको सँभाल ले और उठकर खड़ा हो जाय, वही बुद्धिमान और विचारयुक्त व्यक्ति की पहचान है ।

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