महाभारत काल में कर्ण ने दुर्योधन को मित्र मान लिया । उसने यह धारणा बना ली कि मुझे तो प्रत्येक स्थिति में मित्र का साथ देना है । मित्र सही करे, गलत करे अथवा न्याय करे या अन्याय करे, बस मुझे तो अपने मित्र के ही पक्ष में रहना है । इसीलिए उसने युद्ध में दुर्योधन की ओर से लड़ते हुए अपने प्राण भी दे दिए । लोग कर्ण की प्रशंसा करते हैं । सचमुच वह बड़ा वीर योद्धा और दानी था । उसने किसी प्रकार के लोभ को जीवन में स्वीकार नहीं किया । पर इन सद्गुणों से सम्पन्न होने पर भी उसने अन्याय और दुर्गुणों के प्रतीक दुर्योधन का साथ दिया, बुराई का पक्ष लिया, समर्थन किया । ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो मानते हैं कि जिससे एक बार जुड़ गए तो अन्त तक निर्वाह करना चाहिए । यह धारणा सुनने में चाहे बड़ी ऊँची लगती हो पर इसके मूल में विवेक का लेश भी नहीं है ।
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