Monday, 17 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

दैत्य जाति में जन्म लेने वाले बलि ने अपने पौरुष और पराक्रम से युद्ध में सारे देवताओं को हरा दिया और इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्ग दोनों पर अधिकार कर लिया । इन्द्र को यह चिन्ता हो गई कि दैत्यों से लड़कर उन्हें हरा पाना तो हमारे लिए सम्भव है नहीं, अतः हम अपना स्वर्ग कैसे वापस ले सकते हैं । उन्हें लगा कि यह कार्य बिना भगवान का आश्रय लिए सम्भव नहीं है । ऐसा विचार कर सब देवताओं सहित इन्द्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि प्रभु ! आप हमारी सहायता करें । देवताओं और दैत्यों का एक बड़ा अन्तर सामने आया । देवताओं की विशेषता यह नहीं है कि उनमें भोग और वासनाओं का अभाव है । भोगों की लालसा तो देवताओं और दैत्यों में एक जैसी ही है, पर भोगों की प्राप्ति और अपनी पराजय के प्रति दोनों के दृष्टिकोण में अन्तर भी है । दैत्यों को अपनी योग्यता और पुरुषार्थ पर भरोसा है, पर देवता असफलता के क्षणों में अपनी असमर्थता स्वीकार कर ईश्वर की शरणागति ग्रहण करते हैं ।

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