लंकिनी हनुमानजी को अपनी आत्मकथा सुनाती है । मानो यही मन की कथा है, प्रवृत्ति की कथा है । लंकिनी ने कहा कि मैं तो यहाँ बहुत काल से लंका की रक्षिका के रूप में कार्यरत हूँ । जब ब्रह्माजी ने मेरा निर्माण किया उस समय मैंने उनसे अपना भविष्य जानने की इच्छा व्यक्त की, तब उन्होंने बताया था कि प्रारंभ में तुम देवताओं, यक्षों के अधिन रहोगी पर अन्त में तुम्हारे ऊपर राक्षसों का अधिकार हो जायेगा । सुनकर मुझे पीड़ा हुई कि एक दिन मुझे राक्षसों के द्वारा शासित होना पड़ेगा । यही जीवन का भी सत्य है । हमारे मन की जो प्रवृत्ति है वही लंकिनी है । उसमें जब अच्छे विचार उठते हैं यही मानो उस पर देवताओं का शासन है तथा लोभ और तृष्णा अधिक बढ़ जाएँ तो मानो यही यक्षों का शासन है । और जब दुर्गुण-दुर्विचारों के द्वारा मन संचालित होने लगे तो यही समझना चाहिए कि उस पर राक्षसों का आधिपत्य हो गया है । लंकिनी ने इसे अपने जीवन में अनुभव किया ।
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