गोस्वामीजी का पूर्वजीवन दुख, पीड़ा और अपमान से भरा हुआ था । पर इस पीड़ा और तिरस्कार का सामान्यतया जो परिणाम इसे झेलनेवाले में देखा जाता है, वैसा कुछ हमें गोस्वामीजी के जीवन में दिखाई नहीं देता । किसी बुरे व्यक्ति के जीवन के पूर्व इतिहास की जब खोज की जाती है तो बहुधा यही ज्ञात होता है कि समाज से मिलनेवाले अपमान और पीड़ा के कारण ही वह बुरा और अत्याचारी बन गया था । और बदले की भावना ने ही उसे समाज को पीड़ा पहुँचानेवाला बना दिया था । पर गोस्वामीजी ने अपमान और पीड़ा के विष को पीकर भी रामचरितमानस रूपी वह दिव्य अमृत प्रदान किया जिसे पीकर आज भी अगणित व्यक्ति धन्य हो रहे हैं ।
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