Monday, 3 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

हनुमानजी समुद्र पार करने के लिए जब निकले तो सबसे पहले मैनाक पर्वत समुद्र से निकलकर उनके सामने आ गया और उसने हनुमानजी को निमंत्रण दिया कि पहले आप विश्राम कर लीजिए फिर आगे जाइए । पर हनुमानजी उस स्वर्णपर्वत मैनाक को स्पर्श भर करने के बाद उसे प्रणाम कर उससे विदा लेते हैं । हनुमानजी के इस कार्य के माध्यम से उनके चरित्र की पूर्णता और विशेषता के कई सूत्र हमारे सामने आते हैं । संसार में अपने आपको त्यागी मानने वाले व्यक्ति बहुधा यह कहते सुने जाते हैं कि 'अरे ! मैंने लाखों को ठोकर मार दी ।' वे बताना चाहते हैं कि उन्होंने कितना बड़ा त्याग किया है ! पर आप विचार करें कि यह त्याग वास्तविक है क्या ? यह तो किसी त्यागी की नहीं, बहुत बड़े अभिमानी की भाषा है । हनुमानजी ने मैनाक पर्वत से यह नहीं कहा कि 'जाओ, हम सोने के पर्वत को लात मारते हैं' अपितु उन्होंने मैनाक पर्वत को प्रणाम किया और नम्रतापूर्वक यह कहा कि मैं 'रामकार्य' का एक उद्देश्य लेकर चला हूँ और जब तक वह पूरा नहीं हो जाता तब तक मुझे विश्राम नहीं मिलेगा । इसके द्वारा हनुमानजी ने जो सूत्र दिया वह उनकी सजगता का परिचायक था । उसमें स्वर्ण पर्वत का त्याग है पर उनमें इस त्याग के अभिमान का लेश भी नहीं है । इसका अभिप्राय है कि त्याग के साथ त्याग का विवेक सार्थक है, पर यदि वस्तु के त्याग होने पर त्याग का अभिमान बढ़ जाय तो फिर उस त्याग का कोई महत्व नहीं रह जाता ।

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