हनुमान जी के समुद्र पार करने के बीच में सुरसा परीक्षा लेने आई थी अतः उसने कहा कि मैं तो तुम्हें अभी खाऊँगी । और जब उसने खाने के लिए अपना मुँह फैलाया तो हनुमानजी ने अपना शरीर दूना कर लिया । फिर दोनों में एक होड़-सी लग गई । सुरसा जितना मुँह फैलाती है, हनुमानजी उससे दूने हो जाते हैं । अन्त में जब सुरसा ने सौ योजन का मुँह बना लिया तो, यद्यपि हनुमानजी चाहते तो वे भी दो सौ योजन के बन सकते थे, पर वर्णन आता है कि सुरसा जब यह सोचकर कि देखूँ, अब बन्दर कितना ऊँचा जाता है, आँख खोलकर चारों ओर देखती है तो उसे बड़ा आश्चर्य होता है क्योंकि हनुमानजी कहीं दिखाई नहीं देते ? गोस्वामीजी कहते हैं - वे इतने छोटे बन गए कि सुरसा उन्हें ढूँढ़ ही नहीं पा रही है । हनुमानजी केवल छोटे ही नहीं बन गए, अपितु सुरसा के मुख में प्रविष्ट होकर बाहर भी आ गए । मानो इसमें सूत्र यही है कि अपने आपको बड़े-से-बड़ा बनाने की शक्ति रखते हुए भी जो अपने आपको अति लघु अर्थात शून्य बना सकता है ऐसा अभिमानरहित व्यक्ति ही लंका में प्रवेश कर वहाँ से सुरक्षित लौट सकता है ।
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