पुराणों में कथा आती है कि भगवान विष्णु के बताने पर अमृत पाने के लिए देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र-मंथन की प्रक्रिया प्रारंभ की । पर मन्थन के परिणामस्वरूप जो प्रथम वस्तु बाहर निकली उसके कारण एक भयावह दृश्य उपस्थित हो गया । क्योंकि समुद्र से एक नीलवर्ण का भयानक विष बाहर निकल आया जिसकी ज्वाला में देवताओं और दैत्यों के साथ संसार में सब-के-सब जलने लगे । व्याकुल होकर देवताओं ने भगवान विष्णु को उलाहना दिया - महाराज ! आपने कहा था कि अमृत निकलेगा, पर यहाँ तो अमृत के स्थान पर विष निकल आया ! यह हमारे जीवन का भी सत्य है । हम सब चाहते हैं कि हमें सुख मिले और हमारे दुख दूर हों । हर व्यक्ति, चाहे वह भला हो या बुरा हो, देवता हो अथवा दैत्य हो यही चाहता है । बहुधा यह देखा जाता है कि वान्छित सुख के स्थान पर जब जीवन में दुख, प्रतिकूलता अथवा संकट आ जाय तो अधिकांश व्यक्तियों की आस्था डगमगाने लगती है । लोगों को लगता है कि शास्त्रों में जो लिखा हुआ है कि जिस कार्य से जैसा परिणाम मिलना चाहिए, वैसा न होकर विपरित क्यों हो रहा है ? देवताओं के मन में भी यही संशय उत्पन्न हो गया । भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाते हुए कहा कि घबराओ मत ! अमृत निकलने से पहले विष भी निकलता है । तुम धैर्य रखो, अमृत भी अवश्य निकलेगा ।
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