बाल्मीकि-रामायण में मेघनाद-विभीषण संवाद के रूप में एक प्रसंग हमारे सामने आता है । युद्धस्थल में मेघनाद ने जब विभीषण को देखा तो उसके क्रोध की सीमा नहीं रही । उसने विभीषण जी को फटकारते हुए कहा - तुम कृतघ्न हो, भ्रातदोही हो ! जिस बड़े भाई ने पुत्र की तरह तुम्हारा लालन-पालन किया, तुम्हें हर प्रकार की सुख-सुविधा और छूट दी, उस पर जब संकट का समय आया तो तुम उसे छोड़कर निकल गए ? इस तरह का तर्क बहुत-से लोगों को बड़ा अच्छा लगता है पर विभीषण जी ने जो उत्तर दिया वह बड़े महत्व का है ।
विभीषण जी ने कहा कि जैसे किसी एक मकान में हमारा जन्म हुआ, लालन-पालन हुआ, उपनयन आदि संस्कार हुए और यदि एक दिन उस मकान में आग लग जाय और हम यह निर्णय करें कि जिस घर में मैं जन्म से लेकर अब तक जुड़ा रहा उसे छोड़कर नहीं भागूँगा भले ही वहाँ जलकर मर जाऊँ, तो क्या यह विवेकपूर्ण निर्णय कहा जा सकता है ? बुद्धिमान वह नहीं है कि जो घर में आग लगने पर घर के भीतर बैठकर मर जाय और यह कहे कि मैंने घर से बड़ा प्रेम किया है, अपितु बुद्धिमान तो वह है जो घर से बाहर निकले और आग बुझाने की चेष्टा करे । विभीषण जी ने कहा कि मैंने तो यही चाहा कि लंका बच जाय और सब निशाचरगण लंका में जो आग लगी है उसमें जलने न पावें । विभीषण रावण को समझाने की चेष्टा करते हैं पर वह दुराग्रही है, हठी है । वह विभीषण जी की बात नहीं सुनता । तो क्या ऐसी स्थिति में विभीषण को रावण का साथ देते हुए उसके साथ ही जलकर मर जाना चाहिए ? समाज में भी परिवर्तन इस निष्ठा से नहीं होगा कि हम जिसके साथ हैं, उसमें अच्छाई हो या बुराई हो, हम सदैव उसका साथ देते रहेंगे । संसार में अधिकांश लोग यही चाहते हैं कि बुरे कर्मों में भी लोग हमारा साथ दें इसलिए वे ऐसे निष्ठावालों की पीठ ठोंकते हैं । पर यह पीठ ठोंकने वाली बात नहीं है । बुराई को समझने के बाद निष्ठा के नाम पर उसे न छोड़ने की धारणा भले ही स्वार्थी व्यक्तियों की दृष्टि में ऊँची बात हो, पर सिद्धांत की दृष्टि से यह धारणा अविवेकपूर्ण ही मानी जायेगी ।
विभीषण जी ने कहा कि जैसे किसी एक मकान में हमारा जन्म हुआ, लालन-पालन हुआ, उपनयन आदि संस्कार हुए और यदि एक दिन उस मकान में आग लग जाय और हम यह निर्णय करें कि जिस घर में मैं जन्म से लेकर अब तक जुड़ा रहा उसे छोड़कर नहीं भागूँगा भले ही वहाँ जलकर मर जाऊँ, तो क्या यह विवेकपूर्ण निर्णय कहा जा सकता है ? बुद्धिमान वह नहीं है कि जो घर में आग लगने पर घर के भीतर बैठकर मर जाय और यह कहे कि मैंने घर से बड़ा प्रेम किया है, अपितु बुद्धिमान तो वह है जो घर से बाहर निकले और आग बुझाने की चेष्टा करे । विभीषण जी ने कहा कि मैंने तो यही चाहा कि लंका बच जाय और सब निशाचरगण लंका में जो आग लगी है उसमें जलने न पावें । विभीषण रावण को समझाने की चेष्टा करते हैं पर वह दुराग्रही है, हठी है । वह विभीषण जी की बात नहीं सुनता । तो क्या ऐसी स्थिति में विभीषण को रावण का साथ देते हुए उसके साथ ही जलकर मर जाना चाहिए ? समाज में भी परिवर्तन इस निष्ठा से नहीं होगा कि हम जिसके साथ हैं, उसमें अच्छाई हो या बुराई हो, हम सदैव उसका साथ देते रहेंगे । संसार में अधिकांश लोग यही चाहते हैं कि बुरे कर्मों में भी लोग हमारा साथ दें इसलिए वे ऐसे निष्ठावालों की पीठ ठोंकते हैं । पर यह पीठ ठोंकने वाली बात नहीं है । बुराई को समझने के बाद निष्ठा के नाम पर उसे न छोड़ने की धारणा भले ही स्वार्थी व्यक्तियों की दृष्टि में ऊँची बात हो, पर सिद्धांत की दृष्टि से यह धारणा अविवेकपूर्ण ही मानी जायेगी ।
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