Monday, 24 July 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण में वर्णन आता है कि जब रावण की आज्ञा से मारीच कपट-स्वर्णमृग बनकर चला तो बड़ा प्रसन्न दिखाई देता है । मारीच प्रभु के बाण लगने से अपने मरने की कल्पना करके यह जो प्रसन्न हो रहा है, उसके पीछे एक मधुर संकेत है । मारीच को आज स्मरण आता है कि प्रभु जब विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए पधारे थे, उस समय प्रभु ने जो बाण मेरे ऊपर चलाया वह बिना फल वाला, अधूरा बाण था, फिर भी उसके लगने से मेरी यह दशा हो गई कि मैं जिधर देखता उधर राम और लक्ष्मण दोनों भाई ही दिखाई पड़ते थे । मारीच यह सोचकर प्रसन्न हो रहा है कि आज तो फल सहित पूरे बाण का भरपूर स्वाद मिलेगा । मारीच के मनोभाव को इस रूप में समझा जा सकता है कि जैसे आपको किसी फल या मिठाई का एक छोटा-सा टुकड़ा दिया जाय, और उसे चखने के बाद आपको वह इतना स्वादिष्ट प्रतीत हो और यह लगे कि ऐसा अद्भुत स्वाद तो कभी मिला ही नहीं । और एक दिन यह पता चले कि वही फल आपको पूरा-का-पूरा ही मिलने वाला है तो आप प्रसन्न होंगे या नहीं ? मारीच की भी ठीक यही मनःस्थिति है । वह सोचता है कि प्रभु के बिना फल वाले (अधूरे) बाण लगने से जब इतना आनन्द मिला था तो आज, जब फलसहित पूरा बाण लगेगा तो न जाने और कितना आनन्द मिलेगा ! इसका अर्थ है कि जो दुख हमें ईश्वर से जोड़ दे, ईश्वर की स्मृति दिला दे, वह दुख फिर दुख नहीं रह जाता ।

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