गोस्वामीजी ने रामचरितमानस का प्रयाणन किया पर अपने आपको इसका रचियता नहीं मानते । वे कहते हैं कि इस ग्रन्थ की रचना सबसे पहले भगवान शंकर ने की । भगवान शंकर ने सबसे पहले इसकी रचना अपने मानस में की । फिर समय आने पर इसे पार्वतीजी को सुनाया । शंकर के 'मानस' से रचित इस रामचरित्र गाथा का नाम इसीलिए 'रामचरितमानस' पड़ा । गोस्वामीजी जब यह कहते हैं कि 'इस ग्रन्थ की रचना भगवान शंकर ने की' तो वह उनकी शाब्दिक विनम्रता मात्र न होकर एक अनुभूतिजन्य सत्य है । गोस्वामीजी अपने विषय में यह भली-भाँति जानते थे कि जिन गुणों से काव्य-रचना की जाती है, उसमें उसका सर्वथा अभाव है । गोस्वामीजी से पूछा गया कि फिर आपके द्वारा इतने महान ग्रन्थ की रचना कैसे हुई ? इसका उत्तर में वे कहते हैं कि भगवान शंकर के कृपा-प्रसाद से मुझे ऐसी निर्मल मति प्राप्त हो गई जिससे मेरे अन्तःकरण में कवित्त का उदय हो गया । इसलिए इस रचना के मूल में भगवान शंकर की कृपा ही है, अब भले ही ऊपर से कवि के रूप में तुलसीदास दिखाई देता हो ।
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