लंकिनी ने मन की एक और विचित्रता की बात हमारे सामने रखी । वह हनुमानजी से कहती है कि जब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे ऊपर राक्षसों का शासन हो जाएगा तो मैं दुखी हो गई, पर विडम्बना है कि राक्षसों के राज्य में रहते-रहते आज मेरी यह दशा हो गई है कि मैं ब्रह्माजी के वचनों को भी भूल गई और आपको मैंने चोर कहा, खाने की चेष्टा की ! वह कहती है कि मैंने ब्रह्माजी से पूछा था कि महाराज ! फिर परिवर्तन कब होगा ? तो उन्होंने यही कहा कि जब तुम्हारे ऊपर एक बंदर का मुक्का लगेगा जिससे तुम गिर पड़ोगी और तुम्हारे अंदर परिवर्तन आ जाएगा, उस समय तुम समझ लेना कि निशाचरों का विनाश होने ही वाला है । अंत में लंकिनी, हनुमानजी से एक बहुत मधुर बात कहती है कि आप लंका में प्रवेश कीजिए । पूछा जा सकता है - अरे ! तुम लंका में रहनेवाली हो, रावण की सेविका हो, वह तुम्हारा राजा है, तुम हनुमानजी को कैसे लंका में जाने दे रही हो ? लंकिनी ने जो शब्द कहा - 'कोसलपुर राजा' इससे मानो वह बताना चाहती है कि मैं भ्रमवश मान बैठी थी कि लंका का राजा रावण है । रावण तो लंका पर बलात् अधिकार किए बैठा है, इसके वास्तविक राजा तो भगवान राम ही हैं । यह एक शाश्वत सत्य है ।
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