Saturday, 30 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी अपनी प्रशंसा और विरोध दोनों को समत्व में स्थिर रहकर तटस्थ भाव से देखते हैं । वे बड़ी सजगता से आत्मनिरीक्षण करते हैं और सूक्ष्मता से, गहराई से अपने आपको कसते रहते हैं । इस सन्दर्भ में महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में अहिंसा की जो परिभाषा की है, वही सूत्र, वही कसौटी गोस्वामीजी अपने संबंध में प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं । सामान्यतया यही कहा जाता है कि जो मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न दे, वह अहिंसक है । पर महर्षि पतंजलि अहिंसा को एक नया अर्थ देते हुए कहते हैं कि किसी व्यक्ति के जीवन में अहिंसा सिद्ध हो गई है इसका एक ही प्रमाणपत्र कि उसके पास जाने पर दूसरे व्यक्ति के मन के क्रोध आदि वैर-भाव पूरी तरह मिट जायँ । हम क्रोध न करें यह बात तो समझ में आती है, पर हमारे सामने आनेवाला व्यक्ति भी क्रोध न करे तब हमारी अहिंसावृत्ति पूरी है अन्यथा नहीं, यह तो अत्यंत कठिन कसौटी है । इसका तात्पर्य यही है कि हमारे जीवन में थोड़ा-सी अहिंसा की वृत्ति आ जाय तो हमें अपने अहिंसक होने का अभिमान हो जाता है । साधारणतया व्यक्ति इस कसौटी पर अपने आपको कस नहीं सकता । पर ऊँचे लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए ऐसी दृष्टि आवश्यक है ।

Friday, 29 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

विद्वानों की विशेषता कहें या कमी कहें, एक बात बहुधा उनमें पाई जाती है कि वे दूसरों के दोषों का अन्वेषण करते हैं । मुझे स्मरण आता है कि काशी विश्वविद्यालय में जब मेरा प्रवचन चल रहा था, तो मेरे द्वारा मानस की एक पंक्ति कही गई कि - *सपनेहुँ नहि देखहि परदोषा* - जो दूसरों के दोष नहीं देखता, वह भक्त है, अतः दूसरों के दोष नहीं देखने चाहिए । इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वहाँ बैठे हुए संस्कृत के एक पण्डितजी ने मेरे पास एक छोटे-से कागज के टुकड़े पर एक वाक्य लिखकर भेजा । उसमें लिखा हुआ था - 'पण्डितो दोषज्ञः' । इसका अर्थ होता है कि पण्डित वही है जो दोष को जानने वाला है । उनका संकेत यही था कि तुम कह रहे हो कि दोष नहीं देखना चाहिए पर शास्त्र कहता है कि जो दोष को जानता है वह पण्डित है । मैंने उनसे यही निवेदन किया कि यह ठीक है कि 'पण्डितो दोषज्ञः' यह शास्त्रों में लिखा है पर यह तो नहीं लिखा है कि 'अपना दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय कि दूसरों के दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय' ।

Thursday, 28 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने रावण के पास सन्देशवाहक राजदूत भेजने का विचार किया तो इस कार्य के लिए उन्होंने अंगदजी का चुनाव किया । पहली बार समुद्र के किनारे अंगदजी अकेले लंका जाने से सशंकित थे पर आज वे जरा भी सशंकित नहीं हैं । वे तो प्रभु के चरणों की कृपा के विश्वास से भरे हुए हैं । इतना ही नहीं, विश्वास की इससे बड़ी बात और क्या होगी कि रावण की भरी सभा में उन्होंने अपना पैर रोप दिया और यह प्रतिज्ञा कर दी कि रावण ! तुम या तुम्हारी सभा का कोई भी व्यक्ति मेरे पैर को उठा देगा तो मैं वचन देता हूँ कि भगवान राम लौट जाएँगे और मैं श्री सीताजी को हार जाऊँगा । बाद में बन्दरों ने अंगदजी से पूछा कि आपने इतना बड़ा दुस्साहस कैसे किया ? आपको जरा भी डर नहीं लगा । अंगदजी ने कहा कि क्या आप लोगों ने हनुमानजी की कथा नहीं सुनी थी जिसमें उन्होंने रावण से कहा था कि *राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।* - हनुमानजी जैसे भक्त प्रभु-चरणों के प्रभाव से जब रावण-जैसे व्यक्ति के राज्य अचल हो जाने की बात करते हैं, तो क्या प्रभु के स्मरण से मेरा पद अचल नहीं हो जायेगा । मानो हनुमानजी की कथा सुनकर अंगदजी में ऐसा प्रबल विश्वास उत्पन्न हो गया । इस प्रकार कथा के माध्यम से वे चरित्र, वे पात्र हमें कोई न कोई विचार, कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य प्रदान करते हैं । तुलसीदासजी के जीवन में भी ऐसा प्रभाव हमें दिखाई देता है ।

Wednesday, 27 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लंकिनी ने पहले हनुमानजी को चोर कहा पर बाद में वह कहने लगी कि पहले मैं सोचती थी कि लंका का स्वामी, राजा रावण है पर अब मैं समझ गई कि इसके असली स्वामी तो भगवान राम हैं । लंकिनी सत्य को समझ लेती है जिनके सत्संग के प्रभाव से, ऐसे महान धर्मज्ञ हनुमानजी ने जब अशोकवाटिका के फल बिना रावण की आज्ञा के खा लिए, तो इसके पीछे उनका यही तत्वज्ञान था । रावण ने भी उनसे यही कहा था कि मेरी आज्ञा के बिना मेरे बाग के फल खाना तो चोरी है । तो मानो विस्तार से उत्तर देते हुए उन्होंने यही स्पष्ट किया कि यह बाग तुम्हारा नहीं है और जिनकी आज्ञा लेनी चाहिए, उनकी अनुमति से ही मैंने फल खाए हैं । हनुमानजी जानते हैं कि श्रीसीताजी प्रभु की आदिशक्ति हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण किया है । वे जगत् जननी हैं । माँ की आज्ञा लेकर फल खाने के पीछे उनका यही दर्शन और ज्ञान है ।

Tuesday, 26 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

अशोकवाटिका को उजाड़ने के बाद हनुमानजी जब रावण की सभा में लाए गए तो रावण से उनका प्रश्नोत्तर हुआ । उनसे रावण ने जब पूछा कि तुमने किसके बल से वाटिका उजाड़ी ? तो उन्होंने अपना भाषण प्रारंभ किया जिसे सुनकर रावण को लगा कि यह तो बड़ा विचित्र वक्ता है । मैं सीधा-सीधा प्रश्न कर रहा हूँ और यह इतने विस्तार से, इतना लम्बा-चौड़ा उत्तर दे रहा है । हनुमानजी भी सीधे-सीधे भगवान राम का नाम ले सकते थे पर उन्होंने लम्बी भूमिका के साथ अपना वक्तव्य प्रारंभ कर दिया । वे कहने लगे - "सृष्टि के मूल में जो विद्यमान है, जिनका ही बल सर्वत्र व्याप्त है, जिनका बल मेरे भीतर है और तुम्हारे अन्दर भी उन्हीं का बल है, मैं उन्हीं प्रभु का दूत हूँ ।" हनुमानजी रावण के भीतर ईश्वर की अनुभूति जागृत कर उसे प्रभु का भक्त बनाना चाहते हैं । भगवत्कथा का भी यही उद्देश्य है कि सत्संग के माध्यम से व्यक्ति को उसके स्वरूप का स्मरण हो जाय ।

Monday, 25 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमानजी कौन हैं और उनके प्रहार का क्या अर्थ है, यह बताते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि हनुमानजी प्रबल वैराग्य हैं । इसका अर्थ है कि जब व्यक्ति राग और आसक्ति के कारण सत्याचरण से वंचित हो जाता है, उस समय संत के रूप में, वैराग्य के रूप में हनुमानजी-जैसा कोई भक्त आता है जो उसकी मान्यता पर प्रहार करता है जिससे वह व्यक्ति व्याकुल हो जाता है । और यदि उसे इस व्याकुलता से सत्य का ज्ञान हो जाता है तो वह धन्य हो जाता है । पर बहुधा यही देखा जाता है बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जो प्रहार से व्याकुल होते हैं ।

Sunday, 24 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमानजी के प्रहार से लंकिनी को अपने पुराने इतिहास की स्मृति हो आती है । उसे ब्रह्माजी के वरदान की बात याद आ जाती है । लंकिनी लंका नगर की रक्षिका है । लंका पर पहले देवताओं का अधिकार था । बाद में उस पर राक्षसों ने बलपूर्वक अधिकार कर लिया । लंकिनी रावण के संग रहकर रावण के ही चिन्तन को सत्य मानने लगी । उसने रावण की सेवा को ही अपना धर्म मान लिया । पर अब वह कहने लगी कि जब ब्रह्मा के द्वारा मुझे ज्ञात हुआ कि भविष्य में लंका पर राक्षसों का शासन होगा तो मैं दुखी हो गई । ब्रह्माजी ने मुझे दुखी देखकर सांत्वना देते हुए कहा कि यह स्थिति सदा नहीं रहेगी, उसमें परिवर्तन होगा । मैंने पूछा कि उस बदलाव का ज्ञान मुझे कैसे होगा ? तब ब्रह्माजी ने एक सूत्र दिया कि तुम कपि के प्रहार से व्याकुल हो जाओगी, तब राक्षसों का विनाश हो जाएगा । यह 'व्याकुलता' बड़ी महत्वपूर्ण है । क्योंकि समाज में या व्यक्ति में परिवर्तन तभी होगा कि जब उनमें परिवर्तन के लिए व्याकुलता उत्पन्न होगी ।

Saturday, 23 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लंकिनी को रावण की सेवा करते-करते अपने जीवन की पूर्वगाथा का विस्मरण हो गया । कुसंग में पड़कर व्यक्ति भी बदल जाता है और उसे बुराई में दोष दिखना बन्द हो जाता है । लंकिनी ने हनुमानजी को चोर समझ लिया । हनुमानजी ने उस पर मुक्के से प्रहार किया तो कहने लगी कि बड़ा अच्छा सत्संग लाभ हुआ । आश्चर्य होता है कि हनुमानजी ने कोई उपदेश-प्रवचन तो किया नहीं, उसके सिर पर प्रहार किया ! पर इस प्रहार का लंकिनी पर विलक्षण प्रभाव पड़ा । वस्तुतः सत्संग से व्यक्ति पर प्रहार ही तो होता है । उसके चिन्तन पर प्रहार करके यही तो बताया जाता है कि यह ठीक नहीं है । उसे सत्य और सही दिशा का स्मरण कराना ही तो इसका उद्देश्य है ।

Friday, 22 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

कई बार कहा जाता है कि आजकल इतनी कथा हो रही है, इतने लोगों के द्वारा प्रचार हो रहा है, पर उससे समाज को क्या लाभ हो रहा है ? इस सन्दर्भ में एक सज्जन के पास बड़े आँकड़े थे कि सारे देश में रामायण की कितनी प्रतियाँ छपीं, कितने विद्वानों ने शोध-प्रबन्ध लिखे, कितने आयोजन किये गये और उन आयोजनों पर कितना खर्च हुआ । उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में, इतने बड़े रूप में इन प्रयासों के बाद भी समाज का कोई लाभ तो दिखाई नहीं देता । मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक एक बात कही कि कोई व्यक्ति यह पता लगाए कि इस वर्ष देश में पाँच करोड़ या इससे भी अधिक संख्या में छाते बनाए गए और फिर इस आँकड़े के आधार पर कहने लगे कि इतनी बड़ी संख्या में छाते बनने से क्या लाभ, क्योंकि वर्षा तो रुकी नहीं । तो क्या आप इस बात को बहुत बुद्धिमतापूर्ण मानकर छातों का उपयोग और निर्माण बन्द कर देंगे ? कितनी भी संख्या में छाते बना लिए जायँ, वर्षा तो होती ही रहेगी । छाते की उपयोगिता वर्षा बन्द करना नहीं, एक सीमा तक आपको वर्षा से सुरक्षा प्रदान करना है । कथा के प्रचार-प्रसार और श्रवण से यदि हम यह आशा पाल लें कि इसके द्वारा समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएगा तो शायद यह हमारी अतिरंजनापूर्ण धारणा होगी ।

Thursday, 21 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कहा जाता है कि गोस्वामीजी को पत्नी ने फटकार दिया और वे सन्त बन गए । पर यह कहना न तो न्याय-संगत है और न ही ठीक है । संसार में न जाने कितने व्यक्तियों को पारिवारिक जीवन में भर्त्सना और आलोचना सुनने को मिलती है पर वे सबके सब तुलसीदास नहीं बन जाते । तुलसीदास, तुलसीदासजी इसलिए बन गए क्योंकि उनके गुरुदेव ने बाल्यावस्था में उन्हें रामकथा सुनाकर, रामभक्ति के संस्कार, बीज रूप में उनके अन्तःकरण में डाल दिए थे । गुरुदेव ने बार-बार उन्हें जो रामकथा सुनाई - वह उनके अन्तःकरण में विद्यमान थी । उनके जीवन में ऐसा अवसर आया कि लगा कि वे वासना की, भोग की नदी में पूरी तरह डूब चुके हैं । पत्नी के प्रति वे इतने आसक्त थे कि एक दिन भी उनके बिना वे रह नहीं पाते । वे पागलों की भाँति उनके पास दौड़े चले जाते हैं जहाँ उन्हें फटकार मिलती है । उसके बाद उनमें जो परिवर्तन दिखाई देता है उसे हम पत्नी की फटकार से जोड़ देते हैं । पर वस्तुतः उस फटकार का परिणाम यह होता है कि उनके भीतर गुरुदेव से सुनी रामकथा के बीज से उसका अंकुर फुट पड़ता है । गोस्वामीजी ने जो बाल्यावस्था में सुना था, इसका बड़ा महत्व है । उससे न केवल उन्हें अपितु समाज को भी बड़ा लाभ हुआ और आज भी हो रहा है ।

Wednesday, 20 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे । बाल्यावस्था में उन्होंने अभाव, भूख, उपेक्षा, अपमान आदि की पीड़ाएँ झेलीं । ऐसा अभागा बालक शायद ही कोई और मिले जिसे जन्म के तुरन्त बाद ही इतनी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो । फिर गुरुदेव की कृपा से वे रामकथा श्रवण का अवसर प्राप्त करते हैं । इसके पश्चात उनके जीवन में एक लालसा विवाह के रूप में आती है पर इसके बाद उनकी मनोधारा, विचारधारा एक दूसरी दिशा में मुड़ जाती है । बाल्यावस्था में संस्कार के जो बीज गुरुदेव ने डाले थे, वे मानो एक काल विशेष में काम के आकर्षण के द्वारा ढक लिए गये थे, दब गये थे, पर वे नष्ट नहीं हुए । इसे गोस्वामीजी ने सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । वे कहते हैं कि बचपन में व्यक्ति यदि तैरना सीख लेता है तो फिर वह जीवनभर उसे भूल नहीं सकता । तैराकी सिखाने की बात कही जाय तो कहा जा सकता है कि इसकी क्या आवश्यकता है ? बच्चे को क्या तैराक बनना है ? बचपन में सीखने योग्य कई अन्य संस्कारों और बातों के विषय में लोगों का यही तर्क रहता है कि इसकी आवश्यकता नहीं है । जैसे हम यह सोचकर कि 'नित्य के जीवन में तैरने का कोई उपयोग नहीं है' तैरने का बचपन में अभ्यास नहीं करते, पर यदि बचपन में तैरना सीख लें तो भले ही वह प्रतिदिन उपयोगी न हो पर संकट काल में यह कला बड़ा लाभदायी सिद्ध हो सकती है, उसी तरह बाल्यावस्था में अच्छे संस्कार के बीज हमारे अन्तःकरण में डाल दिए जायँ तो अवसर आने पर वे उदित होकर हमारी सहायता कर सकते हैं, रक्षा कर सकते हैं । गोस्वामीजी के जीवन में हमें यही सत्य प्रतिफलित होते हुए दिखाई देता है ।

Tuesday, 19 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

एक बार एक गोष्ठी में गोस्वामीजी पर विचार प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि उनकी जितनी प्रशंसा की जाय वह अल्प है । पर उनकी प्रशंसा करने वालों के साथ-साथ उनके कटु आलोचक भी हैं जिन्होंने उनकी भर्त्सना भी की है । उनमें से कई नाम भी लिये गये । मुझे भी जब बोलने का अवसर मिला तो मैंने यही कहा कि आप लोगों ने जिन व्यक्तियों का नाम लिया है, उनमें से किसी ने गोस्वामीजी की उतनी आलोचना नहीं की है जितनी स्वयं गोस्वामीजी ने अपनी निन्दा की है । और विलक्षणता यह कि उनका यह आत्मनिरीक्षण, आत्मसम्मोहन से कोसों दूर है । आत्मकथा की परम्परा है । विशिष्ट व्यक्तियों की आत्मकथाओं के द्वारा लोगों को प्रेरणा मिलती है । पर यह सम्भावना भी बनी रहती है कि आत्मकथा, आत्मप्रशंसा का रूप न ले ले । व्यक्ति आत्मकथा में अपनी विशेषताओं, महानताओं का यदि वर्णन करने लगे तो इसका अर्थ है कि वह स्वयं पर मुग्ध है, आत्मसम्मोहन की स्थिति में है । गोस्वामीजी व्यामोह से सर्वथा मुक्त हैं ।

Monday, 18 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने काम को भी भगवान से जोड़कर अपने आपको धन्य बना दिया । रामायण के अन्त में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुमने मेरा इतना विशाल चरित्र लिखा, बोलो क्या चाहते हो ? उन्होंने कहा - प्रभु ! अपने चरणों में प्रेम दीजिए । - कैसा प्रेम चाहते हो - भरत की तरह, लक्ष्मण की तरह, हनुमान की तरह, शत्रुघ्न की तरह, शबरी की तरह अथवा निषाद की तरह ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! इन नामों को लेने का अधिकारी मैं नहीं हूँ । इनमें से किसी के समान गुण मुझमें नहीं हैं । - नहीं हैं, तो फिर कैसा प्रेम चाहते हो ? प्रभु ने पूछा । तब गोस्वामीजी बोले - प्रभु !
*कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।*
*तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम ।।*
और सचमुच उन्होंने काम और लोभ को वह दिशा दे दी जो जीवन को सार्थक और धन्य बनाने वाली है ।

Sunday, 17 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी जब यह कहते हैं कि नारी का सौंदर्य एक दीपशिखा की भाँति है तो यह नारी की निन्दा नहीं है । किस घर में अँधेरे को दूर करने के लिए दिया नहीं जलाया जाता ? क्या 'दिए' के बिना किसी घर का कार्य चल सकता है ? निन्दनीय तो वह पतंगा है जो दीपक से प्रकाश न लेकर, उस पर गिरकर स्वयं जल जाता है और कभी-कभी तो दिए को भी बुझा देता है ।

Saturday, 16 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

एक ओर तो गोस्वामीजी ममता की निन्दा करते हैं और दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि 'भगवान राम में ममता बहुत है' । वे कहते हैं कि अयोध्यावासियों पर प्रभु की बड़ी ममता है । पूछा जा सकता है कि ममता निन्दनीय है या प्रशंसनीय है ? इसका उत्तर यही है कि संसार की ममता हमें बाँधती है पर भगवान की ममता से हम बन्धन से छूट जाते हैं और भगवान बन्धन में बँध जाते हैं । ऐसी विलक्षण ममता भगवान से पाकर जीव धन्य हो जाता है । गोस्वामीजी ने इस ममता का अनुभव किया, इसलिए वे कहते हैं कि संसार के ममता के स्थान पर राम से या परोपकार से ममता जीवन को धन्य बना देती है ।

Friday, 15 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी से पूछा गया कि ज्ञान, वैराग्य और भक्ति में श्रेष्ठ कौन है ? उन्होंने कहा - भक्ति श्रेष्ठ है ! - क्यों श्रेष्ठ है ? उन्होंने एक बड़ी सुन्दर आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि माया और भक्ति दोनों ही नारी वर्ग में हैं, नारियाँ हैं । जब वे भक्ति को नारी कहते हैं, तो क्या उन्हें नारी-निन्दक मानने वाले यह मान लेंगे कि वे भक्ति के निन्दक हैं । वे कहते हैं कि ज्ञान और वैराग्य पुरुष होने के कारण माया के प्रलोभन में फँस सकते हैं, लेकिन भक्ति को प्राप्त कर लेने वाला कभी माया के मोह में नहीं फँस सकता, उस पर माया का रंचमात्र भी कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता ।

Thursday, 14 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

'मानस' में बालि और रावण दोनों के जीवन में अहंकार दिखाई देता है । दोनों की पत्नियाँ उन्हें समझाने का यत्न करती हैं क्योंकि उनकी भावना भगवान राम के प्रति बड़ी ऊँची है । पर बालि और रावण दोनों ही इनकी उपेक्षा करते हैं । इन समानताओं के साथ-साथ बालि और रावण में एक मनोवैज्ञानिक अन्तर है । मानो ये अभिमान की दो वृत्तियाँ हैं । रावण का स्वभाव है कि जो भी बात उसके सामने की जाय वह उसे काट देता है । बालि की वृत्ति दूसरे प्रकार की है । वह सामनेवाले की बात का खण्डन नहीं करता, अपितु उससे भी ऊँची बात कर देता है यह दिखाने के लिए कि मैं तुमसे ज्यादा जानता हूँ । इस खण्डन-मण्डन में साध्य एकमात्र अपने अहंकार का प्रदर्शन ही है ।

Wednesday, 13 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गुण और दोष के विषय में मानस में बड़ा ही तथ्यपूर्ण विश्लेषण किया गया है । पुरुष की समस्या है उसका 'मैं' और नारी की समस्या है उसकी 'ममता' । पुरुष शब्द से ही ऐसा ध्वनित होता है कि जैसे वह पुरुषार्थ और शक्ति से संबद्ध है । नारी 'गर्भ' में सन्तान को रखती है, जन्म देती है, उसके लिए अनेक कष्ट उठाती है, उसका लालन-पालन करती है, अतः स्वाभाविक रूप से उसके जीवन में ममता बहुत है । पर यदि हम 'अहं' और 'मम' इन दोनों का उपयोग सही अर्थों में करें तो ये समस्या के स्थान पर कल्याणकारी भी हो सकते हैं ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी की पत्नी के विषय में एक विद्वान प्राध्यापक ने अपने विचार व्यक्त किए हैं । तुलसीदासजी पर उन्होंने जो ग्रन्थ लिखा है उसमें वे कहते हैं कि तुलसीदास की पत्नी बड़ी कर्कशा स्वभाव की थी इसीलिए तुलसीदासजी के जीवन में उनके प्रति विरोध की भावना उत्पन्न हो गई थी । और इसीलिए उनके ग्रन्थों में भी स्त्रियों की निन्दा और विरोध की जो बात दिखाई देती है, इसके मूल में उनकी पत्नी का स्वभाव ही एकमात्र कारण है । पर ऐसा कहना तो गोस्वामीजी के साथ न्याय नहीं है । ऐसी बात तो गोस्वामीजी को नहीं समझ पाने के कारण ही कही जा सकती है । गोस्वामीजी न तो नारी-निन्दक हैं और न ही उन्हें नारी जाति के प्रति कोई विरोध ही है । उनके ग्रन्थों में जहाँ एक ओर नारी-निन्दा के शब्द मिलेंगे, वहीं दूसरी ओर नारी के संबंध में ऊँचे से ऊँचे भावपूर्ण शब्द भी मिलेंगे । सत्य तो यह है कि पुरुष हो अथवा नारी हो, दोनों में गुण और दोष दोनों ही विद्यमान होते हैं ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

यदि आपकी महिमा के शब्द कोई और सुनावे तब तो उसकी कोई सार्थकता भी है, पर आप ही अपने गुणों के गीत गाने लगें, अपने आपको श्रेष्ठ बताकर अपना अभिमान बढ़ाने लगें, तब तो अपने धर्म और कर्तव्य को भुलाकर स्वयं अपना ही तिरस्कार कर दिया । ब्राह्मणत्व को लेकर यदि व्यक्ति में विचार का उदय हो, अपने धर्म की दिशा में चलकर दूसरों को ज्ञान दें, ज्ञान का वितरण करें, इस रूप में ब्राह्मणत्व का अभिमान सार्थक हो सकता है । अब चाहे ब्राह्मण हो या कोई भी वर्ण हो, यदि उसका अभिमान हमें बुराई से बचाता है और अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है तो वह अभिमान भी अच्छा है । इसी प्रकार से बालक के गर्भ-धारण से लेकर उसके लालन-पालन में तपस्या, त्याग और सहनशीलता की वृत्ति ही मूल में विद्यमान है । अब यदि यह सद्वृत्ति किसी एक व्यक्ति या अपने ही पुत्र-पुत्रियों से 'ममता' बनकर जुड़ी रह जाय, तब तो वह संसार में भेद और संघर्ष की सृष्टि करेगी । पर यदि यह वृत्ति अपने और पराए में भेद न कर, सबमें अपने वात्सल्य-वितरण करने की प्रेरणा दे तो यह ममता भी सार्थक हो जाएगी ।

Sunday, 10 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

प्रभु लंका-विजय के पश्चात अयोध्या पधारे । स्वागत के लिए सारा जनसमूह उमड़ पड़ा । समाज में भी यह दृश्य दिखाई देता है । कोई विशिष्ट व्यक्ति आता है तो भीड़ उमड़ पड़ती है । पर उसमें से कुछ व्यक्ति ही निकट आ पाते हैं । कुछ लोग दूर से फूल बरसा देते हैं, जय-जयकार कर देते हैं पर अधिकांश लोगों को दूर से ही देखकर संतोष कर लेना पड़ता है । अब जिसको सामीप्य मिलता है उसे थोड़ा गर्व-सा होता है और दूर रहने वाले के मन में उलाहना का भाव आ जाता है । पर ईश्वर से मिलने में यह दृश्य सर्वथा भिन्न रूप में सामने आता है । भगवान राम ने अयोध्यावासियों के समक्ष अपने आपको अमित रूप में प्रगट कर दिया । जितने अयोध्यावासी थे प्रभु ने उतने ही रूप बना लिए । और सबको पूरे-पूरे ही मिले । जो बड़े थे उनके चरणों में प्रणाम किया, छोटों के सिर पर हाथ रखा और मित्रों को ह्रदय से लगा लिया । प्रत्येक अयोध्यावासी यही सोचकर आनन्दित हो रहा है कि प्रभु मुझसे कितना प्रेम करते हैं कि लंका से लौटकर सीधे मुझसे ही मिले । सभी व्यक्ति प्रभु-प्रेम में इतने निमग्न हो गए कि अगल-बगल देखने की उन्हें सुध ही नहीं रही । यह अच्छा ही हुआ अन्यथा वहाँ जो दृश्य था उसे देखकर वे संकट में पड़ जाते । सचमुच प्रभु ही पूर्ण प्रेम दे सकते हैं ।

Saturday, 9 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

.....कल का शेष.....
मैं एक ऐसी कवयित्री को जानता हूँ जो बड़ी अच्छी कविताएँ लिखती हैं । उन्होंने रत्नावली पर एक पूरा काव्य ही लिख डाला और यह कहा कि यदि रत्नावली ने तुलसीदास को फटकारा न होता तो तुलसीदास, 'तुलसीदास' नहीं बन पाते । मैंने उनसे यही कहा कि यदि पत्नी की फटकार से तुलसीदास बनते होते तो अब तक न जाने कितने तुलसीदास पैदा हो गए होते । पर ऐसा तो होता नहीं । वह तो ईश्वर की अनुकम्पा थी कि उस क्षण उनके मुख से जो वाक्य निकला वह प्रेरक बन गया । जिससे वे 'काम' की खोज में चलते-चलते राम की खोज में प्रवृत्त हो गए । और जो सुख उन्हें काम में दिखाई दिया था उससे अनन्त गुना सुख उन्हें राम में दिखाई दिया । वे समझ गए कि हमारी प्रेम की आकांक्षा को पत्नी पूरा नहीं कर सकती, उसे तो केवल भगवान राम ही पूरा कर सकते हैं । भगवान राम का प्रेम कभी बँटता नहीं । वे बड़े अनोखे हैं जिसे अपना प्रेम देते हैं उसे पूरा प्रेम देते हैं ।

Friday, 8 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कहा जाता है कि गोस्वामीजी की पत्नी के भाई आए और किसी उत्सव में सम्मिलित होने के लिए उनके साथ वे अपने पिता के घर चली गयीं । गोस्वामीजी इस विरह-वेदना से व्याकुल हो जाते हैं । उस सन्तप्तावस्था में वे, चाहे हम इसे सत्य कहें या काव्य मानें, अन्धेरी रात्रि में एक शव पर सवार होकर नदी को पार करते हैं । घर का द्वार बन्द पाकर खिड़की के मार्ग से प्रवेश कर पत्नी से मिलने के लिए व्यग्र दिखाई देते हैं । वासना की प्रबलता उन्हें इस दिशा में प्रेरित करती है । पत्नी उन्हें इस रूप में आया देखकर व्याकुल हो उठती हैं । इसीलिए नहीं कि वे एक सिद्धावस्था प्राप्त कोई महात्मा थीं । यद्यपि वे एक भावमयी, प्रेममयी नारी थीं और गोस्वामीजी से प्रेम करती थीं, पर उनको समाज की मर्यादा का भी ध्यान था । उनको लगा कि लोग सुनेंगे तो क्या सोचेंगे ! इसलिए उन्होंने गोस्वामीजी को उलाहना दिया । उनके मुँह से उस समय जो फटकार-भरे वाक्य निकले, वे गोस्वामीजी के लिए तो मानो वरदान बन गए । अब आप यह मानने की भूल न करिएगा । लोग ऐसी भूल करते हैं ।
     .....आगे कल ....

Thursday, 7 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी को बाल्यावस्था में किसी का स्नेह नहीं मिला, अतः जब विवाह हुआ तो स्वाभाविक था कि उनके ह्रदय का पूरा आकर्षण पत्नी के प्रति प्रगट हो । कुछ इस तरह कि जैसे एक व्यक्ति लम्बे समय तक भूखा रहने के बाद भूख की तीव्रता का अनुभव करता है । वे इसके प्रतिदान की आशा पत्नी से भी करते हैं । पर दोनों की स्थितियों में अन्तर है । पत्नी के पिता हैं, भाई है, आत्मीय और परिवार-जन हैं । उन सबके प्रति भी उनका कर्तव्य है । गोस्वामीजी चाहते हैं कि उनकी पत्नी अपना पूरा-पूरा स्नेह बस उन्हीं को दे । सत्य तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वही केन्द्र में रहे और अन्य सब उसके लिए ही सोचें, करें । इस तरह झगड़ा शुरु हो जाता है । प्रेम तो सब चाहते हैं, पर बँटवारा नहीं, पूरा चाहते हैं ।

Wednesday, 6 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अवध में अनेक सन्त ऐसे हैं जो यह नहीं मानते कि गोस्वामीजी ने विवाह किया था । वे सोचते हैं कि यह मान लेने पर कि गोस्वामीजी ने विवाह किया था उनका स्थान इतना ऊँचा नहीं रह जायेगा । उन सन्तों का यही आग्रह है कि गोस्वामीजी बाल-ब्रह्मचारी थे । गोस्वामीजी तो महान थे ही, पर वे बाल-ब्रह्मचारी थे इसलिए महान थे अथवा वे जन्मजात महान थे, यह सिद्ध करने की चेष्टा करने का कोई बहुत महत्व नहीं है । क्या विवाह करके वे महान नहीं रह जायेंगे ? वस्तुतः बाल-ब्रह्मचारी या जन्मजात महान सिद्ध करने से वे हमारे लिए उतने आदर्श नहीं होंगे जितना यह जानकर कि गोस्वामीजी हम लोगों के बीच थे और हम लोगों जैसे ही थे । उन्होंने भी हम लोगों के जीवन में जैसी समस्याएँ आती हैं उनका अनुभव किया और उनका समाधान ढूँढ़ा । गोस्वामीजी ने अपने ग्रन्थों में इसका वर्णन किया है । और वे स्वीकार करते हैं कि सचमुच उनके जीवन में यह अवसर आया ।

Tuesday, 5 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने काल को प्रभु के धनुष और बाण से जोड़कर एक नया रूप दे दिया, नया अर्थ दे दिया । ईश्वर से इसे जोड़कर उन्होंने काल की दूरी को समाप्त कर दिया । राम यदि मनुष्य होते तो एक सामान्य इतिहास के व्यक्ति की तरह उनका तिरोधान हो जाता पर वे ईश्वर हैं इसलिए आज भी हैं । धनुष-बाण के रूप में काल आज भी है । और जब हम ईश्वर के निकट पहुँच जाते हैं तो काल से मुक्त हो जाते हैं । ईश्वर से डरकर हम काल से निर्भय हो जाते हैं । गोस्वामीजी ने यह स्थिति अपने जीवन में पा ली थी । वे ईश्वर का आश्रय पाकर सब भयों से मुक्त हो गए थे । पर यह भी सत्य है कि उन्होंने प्रारंभ में जीवन की विभीषिकाओं को भी भोगा । उन्हें भिक्षा माँगकर खाना पड़ा, गुरुदेव का आश्रय न मिलता तो न जाने उनकी क्या स्थिति होती ।

Monday, 4 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामचरितमानस में वर्णन आता है कि बालि ने जब भगवान राम से पूछा कि आपने मुझे छिपकर क्यों मारा ? तो भगवान राम ने मुस्कराकर बालि से पूछा कि तुम मुझे मनुष्य मानते हो कि ईश्वर मानते हो ? बालि ने कहा - महाराज ! मैं तो आपको ईश्वर मानता हूँ । भगवान बोले - ईश्वर मानते हो तो तुमको प्रश्न पूछना ही नहीं चाहिए । - क्यों ? भगवान राम बोले - आज तक ईश्वर ने किसी को सामने आकर मारा है क्या ? ईश्वर जब मारता है छिपकर ही मारता है । इसलिए भगवान राम ने बालि को वृक्ष की आड़ में छिपकर मारा, यह कहकर उन्हें दोष देना उचित नहीं है । क्योंकि ईश्वर तो कभी सामने आता ही नहीं, व्यक्ति के कर्म ही सामने आते हैं । कर्म के आड़ से ही काल का बाण नित्य चल रहा है । इतने व्यक्ति निरन्तर मर रहे हैं पर क्या यह पता चलता है कि किसने मारा ? तो क्या इस पर ईश्वर से प्रश्न करना उचित है कि आपने मुझे क्यों मारा ? हाँ, यदि यह प्रश्न उठे कि 'आखिर इस काल का समाधान क्या है' तो यह उचित है ।

Sunday, 3 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

श्रीमद्भागवत पुराण में प्रसंग आता है कि परीक्षितजी को यह शाप दिया गया कि सात दिन में सर्प तुम्हें डसेगा और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी यह शाप परीक्षित को ही नहीं, संसार के समस्त लोगों को है । सात दिनों में ही तो कोई ऐसा दिन होगा जब काल डस लेगा । श्रीमद्भागवत सुनने का अर्थ यही है कि काल तो डसेगा ही पर सात दिन के रूप में यह जो दुर्लभ समय हमारे पास है, उस समय को हम भगवान की मंगलमयी कथा सुनकर धन्य बना लेते हैं । तब इससे हमारे जीवनकाल में ही मृत्यु का जो भय है वह छूट जाता है । परीक्षित अन्त में यही कहते हैं कि भागवत की कथा सुनकर मैं निश्चिंत और मृत्यु के भय से मुक्त हो गया हूँ । अब चाहे सर्प डस ले, शरीर न रहे पर आत्मतत्व के रूप में जो सत्य है वह कभी नष्ट नहीं होता । गोस्वामीजी अपने मन को इसी सत्य से साक्षात्कार करने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि जो काल के दण्ड को धारण किए हुए हैं तू निरन्तर उनका आश्रय ले, काल के भय से छूटने का एकमात्र यही उपाय है ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी जो रामकथा सुनाते हैं उसका श्रोता उनका मन ही है । लंकाकाण्ड के प्रारंभ में वे मन से कहते हैं कि जरा इसे ध्यान से देखो, यह धनुष-बाण है । मन कह सकता है कि क्या धनुष-बाण भी कोई देखने की विशेष वस्तु है ? गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रभु के धनुष और बाण काल के ही दो रूप हैं । धनुष प्रभु के हाथ में रहता है और बाण चलता है, दूर-दूर तक जाता है पर अन्त में वह भी वापस प्रभु के तरकश में आ जाता है । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम साक्षात ईश्वर हैं और उनके हाथ में जो धनुष है वह अचल, स्थिर काल का प्रतीक है । प्रभु के बाण कालखण्ड - पल, क्षण, माह, वर्ष, युग आदि के प्रतीक हैं । इस तरह अखण्ड काल और बँटे हुए कालखण्ड दोनों के पीछे ही भगवान के कर-कमल विद्यमान हैं । जिसे वे ग्रहण करते हैं वह अचल और स्थिर है तथा जिसे वे प्रेरित करते हैं वह गतिशील काल है । पर वह काल भी अन्त में प्रभु के पास ही लौटकर आ जाता है । इसीलिए काल के संबंध में हमारी यह धारणा नहीं है कि वह वापस नहीं लौटता । भारतीय चिन्तन-पद्धति में काल को चक्राकार माना जाता है । दिन, वर्ष, युग सब क्रमशः आते-जाते रहते हैं । इसे हम विष्णु भगवान का चक्र कहें या भगवान राम के बाण के रूप में देखें दोनों ही रूपों में यह गतिशील काल निरन्तर लौटकर आता रहता है ।

Friday, 1 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

परशुरामजी और भगवान राम में जब संवाद होता है तो परशुरामजी भगवान राम से कहते हैं कि तुमको देखकर तो नहीं लगता कि तुम डरनेवाले हो, पर तुम्हारे शब्दों को सुनकर नहीं लगता कि तुम निडर हो । तो भगवान राम ने एक बड़ी विलक्षण बात कही । वे कहते हैं - महाराज ! आप जैसे महापुरुषों से डरता हूँ इसीलिए काल से भी नहीं डरता । इसलिए यदि हम लोगों के जीवन में धनुष-बाण को देखकर थोड़ा भय होता है तो उसे बना रहने दें क्योंकि वह कल्याणकारी है ।