यदि आपकी महिमा के शब्द कोई और सुनावे तब तो उसकी कोई सार्थकता भी है, पर आप ही अपने गुणों के गीत गाने लगें, अपने आपको श्रेष्ठ बताकर अपना अभिमान बढ़ाने लगें, तब तो अपने धर्म और कर्तव्य को भुलाकर स्वयं अपना ही तिरस्कार कर दिया । ब्राह्मणत्व को लेकर यदि व्यक्ति में विचार का उदय हो, अपने धर्म की दिशा में चलकर दूसरों को ज्ञान दें, ज्ञान का वितरण करें, इस रूप में ब्राह्मणत्व का अभिमान सार्थक हो सकता है । अब चाहे ब्राह्मण हो या कोई भी वर्ण हो, यदि उसका अभिमान हमें बुराई से बचाता है और अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देता है तो वह अभिमान भी अच्छा है । इसी प्रकार से बालक के गर्भ-धारण से लेकर उसके लालन-पालन में तपस्या, त्याग और सहनशीलता की वृत्ति ही मूल में विद्यमान है । अब यदि यह सद्वृत्ति किसी एक व्यक्ति या अपने ही पुत्र-पुत्रियों से 'ममता' बनकर जुड़ी रह जाय, तब तो वह संसार में भेद और संघर्ष की सृष्टि करेगी । पर यदि यह वृत्ति अपने और पराए में भेद न कर, सबमें अपने वात्सल्य-वितरण करने की प्रेरणा दे तो यह ममता भी सार्थक हो जाएगी ।
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