Saturday, 23 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लंकिनी को रावण की सेवा करते-करते अपने जीवन की पूर्वगाथा का विस्मरण हो गया । कुसंग में पड़कर व्यक्ति भी बदल जाता है और उसे बुराई में दोष दिखना बन्द हो जाता है । लंकिनी ने हनुमानजी को चोर समझ लिया । हनुमानजी ने उस पर मुक्के से प्रहार किया तो कहने लगी कि बड़ा अच्छा सत्संग लाभ हुआ । आश्चर्य होता है कि हनुमानजी ने कोई उपदेश-प्रवचन तो किया नहीं, उसके सिर पर प्रहार किया ! पर इस प्रहार का लंकिनी पर विलक्षण प्रभाव पड़ा । वस्तुतः सत्संग से व्यक्ति पर प्रहार ही तो होता है । उसके चिन्तन पर प्रहार करके यही तो बताया जाता है कि यह ठीक नहीं है । उसे सत्य और सही दिशा का स्मरण कराना ही तो इसका उद्देश्य है ।

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