Tuesday, 26 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

अशोकवाटिका को उजाड़ने के बाद हनुमानजी जब रावण की सभा में लाए गए तो रावण से उनका प्रश्नोत्तर हुआ । उनसे रावण ने जब पूछा कि तुमने किसके बल से वाटिका उजाड़ी ? तो उन्होंने अपना भाषण प्रारंभ किया जिसे सुनकर रावण को लगा कि यह तो बड़ा विचित्र वक्ता है । मैं सीधा-सीधा प्रश्न कर रहा हूँ और यह इतने विस्तार से, इतना लम्बा-चौड़ा उत्तर दे रहा है । हनुमानजी भी सीधे-सीधे भगवान राम का नाम ले सकते थे पर उन्होंने लम्बी भूमिका के साथ अपना वक्तव्य प्रारंभ कर दिया । वे कहने लगे - "सृष्टि के मूल में जो विद्यमान है, जिनका ही बल सर्वत्र व्याप्त है, जिनका बल मेरे भीतर है और तुम्हारे अन्दर भी उन्हीं का बल है, मैं उन्हीं प्रभु का दूत हूँ ।" हनुमानजी रावण के भीतर ईश्वर की अनुभूति जागृत कर उसे प्रभु का भक्त बनाना चाहते हैं । भगवत्कथा का भी यही उद्देश्य है कि सत्संग के माध्यम से व्यक्ति को उसके स्वरूप का स्मरण हो जाय ।

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