Saturday, 9 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

.....कल का शेष.....
मैं एक ऐसी कवयित्री को जानता हूँ जो बड़ी अच्छी कविताएँ लिखती हैं । उन्होंने रत्नावली पर एक पूरा काव्य ही लिख डाला और यह कहा कि यदि रत्नावली ने तुलसीदास को फटकारा न होता तो तुलसीदास, 'तुलसीदास' नहीं बन पाते । मैंने उनसे यही कहा कि यदि पत्नी की फटकार से तुलसीदास बनते होते तो अब तक न जाने कितने तुलसीदास पैदा हो गए होते । पर ऐसा तो होता नहीं । वह तो ईश्वर की अनुकम्पा थी कि उस क्षण उनके मुख से जो वाक्य निकला वह प्रेरक बन गया । जिससे वे 'काम' की खोज में चलते-चलते राम की खोज में प्रवृत्त हो गए । और जो सुख उन्हें काम में दिखाई दिया था उससे अनन्त गुना सुख उन्हें राम में दिखाई दिया । वे समझ गए कि हमारी प्रेम की आकांक्षा को पत्नी पूरा नहीं कर सकती, उसे तो केवल भगवान राम ही पूरा कर सकते हैं । भगवान राम का प्रेम कभी बँटता नहीं । वे बड़े अनोखे हैं जिसे अपना प्रेम देते हैं उसे पूरा प्रेम देते हैं ।

No comments:

Post a Comment