Monday, 18 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी ने काम को भी भगवान से जोड़कर अपने आपको धन्य बना दिया । रामायण के अन्त में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुमने मेरा इतना विशाल चरित्र लिखा, बोलो क्या चाहते हो ? उन्होंने कहा - प्रभु ! अपने चरणों में प्रेम दीजिए । - कैसा प्रेम चाहते हो - भरत की तरह, लक्ष्मण की तरह, हनुमान की तरह, शत्रुघ्न की तरह, शबरी की तरह अथवा निषाद की तरह ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! इन नामों को लेने का अधिकारी मैं नहीं हूँ । इनमें से किसी के समान गुण मुझमें नहीं हैं । - नहीं हैं, तो फिर कैसा प्रेम चाहते हो ? प्रभु ने पूछा । तब गोस्वामीजी बोले - प्रभु !
*कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।*
*तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम ।।*
और सचमुच उन्होंने काम और लोभ को वह दिशा दे दी जो जीवन को सार्थक और धन्य बनाने वाली है ।

No comments:

Post a Comment