Friday, 8 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कहा जाता है कि गोस्वामीजी की पत्नी के भाई आए और किसी उत्सव में सम्मिलित होने के लिए उनके साथ वे अपने पिता के घर चली गयीं । गोस्वामीजी इस विरह-वेदना से व्याकुल हो जाते हैं । उस सन्तप्तावस्था में वे, चाहे हम इसे सत्य कहें या काव्य मानें, अन्धेरी रात्रि में एक शव पर सवार होकर नदी को पार करते हैं । घर का द्वार बन्द पाकर खिड़की के मार्ग से प्रवेश कर पत्नी से मिलने के लिए व्यग्र दिखाई देते हैं । वासना की प्रबलता उन्हें इस दिशा में प्रेरित करती है । पत्नी उन्हें इस रूप में आया देखकर व्याकुल हो उठती हैं । इसीलिए नहीं कि वे एक सिद्धावस्था प्राप्त कोई महात्मा थीं । यद्यपि वे एक भावमयी, प्रेममयी नारी थीं और गोस्वामीजी से प्रेम करती थीं, पर उनको समाज की मर्यादा का भी ध्यान था । उनको लगा कि लोग सुनेंगे तो क्या सोचेंगे ! इसलिए उन्होंने गोस्वामीजी को उलाहना दिया । उनके मुँह से उस समय जो फटकार-भरे वाक्य निकले, वे गोस्वामीजी के लिए तो मानो वरदान बन गए । अब आप यह मानने की भूल न करिएगा । लोग ऐसी भूल करते हैं ।
     .....आगे कल ....

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