विद्वानों की विशेषता कहें या कमी कहें, एक बात बहुधा उनमें पाई जाती है कि वे दूसरों के दोषों का अन्वेषण करते हैं । मुझे स्मरण आता है कि काशी विश्वविद्यालय में जब मेरा प्रवचन चल रहा था, तो मेरे द्वारा मानस की एक पंक्ति कही गई कि - *सपनेहुँ नहि देखहि परदोषा* - जो दूसरों के दोष नहीं देखता, वह भक्त है, अतः दूसरों के दोष नहीं देखने चाहिए । इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वहाँ बैठे हुए संस्कृत के एक पण्डितजी ने मेरे पास एक छोटे-से कागज के टुकड़े पर एक वाक्य लिखकर भेजा । उसमें लिखा हुआ था - 'पण्डितो दोषज्ञः' । इसका अर्थ होता है कि पण्डित वही है जो दोष को जानने वाला है । उनका संकेत यही था कि तुम कह रहे हो कि दोष नहीं देखना चाहिए पर शास्त्र कहता है कि जो दोष को जानता है वह पण्डित है । मैंने उनसे यही निवेदन किया कि यह ठीक है कि 'पण्डितो दोषज्ञः' यह शास्त्रों में लिखा है पर यह तो नहीं लिखा है कि 'अपना दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय कि दूसरों के दोष देखनेवाले को पण्डित माना जाय' ।
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