गोस्वामीजी ने काल को प्रभु के धनुष और बाण से जोड़कर एक नया रूप दे दिया, नया अर्थ दे दिया । ईश्वर से इसे जोड़कर उन्होंने काल की दूरी को समाप्त कर दिया । राम यदि मनुष्य होते तो एक सामान्य इतिहास के व्यक्ति की तरह उनका तिरोधान हो जाता पर वे ईश्वर हैं इसलिए आज भी हैं । धनुष-बाण के रूप में काल आज भी है । और जब हम ईश्वर के निकट पहुँच जाते हैं तो काल से मुक्त हो जाते हैं । ईश्वर से डरकर हम काल से निर्भय हो जाते हैं । गोस्वामीजी ने यह स्थिति अपने जीवन में पा ली थी । वे ईश्वर का आश्रय पाकर सब भयों से मुक्त हो गए थे । पर यह भी सत्य है कि उन्होंने प्रारंभ में जीवन की विभीषिकाओं को भी भोगा । उन्हें भिक्षा माँगकर खाना पड़ा, गुरुदेव का आश्रय न मिलता तो न जाने उनकी क्या स्थिति होती ।
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