Sunday, 3 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी जो रामकथा सुनाते हैं उसका श्रोता उनका मन ही है । लंकाकाण्ड के प्रारंभ में वे मन से कहते हैं कि जरा इसे ध्यान से देखो, यह धनुष-बाण है । मन कह सकता है कि क्या धनुष-बाण भी कोई देखने की विशेष वस्तु है ? गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रभु के धनुष और बाण काल के ही दो रूप हैं । धनुष प्रभु के हाथ में रहता है और बाण चलता है, दूर-दूर तक जाता है पर अन्त में वह भी वापस प्रभु के तरकश में आ जाता है । गोस्वामीजी कहते हैं कि भगवान राम साक्षात ईश्वर हैं और उनके हाथ में जो धनुष है वह अचल, स्थिर काल का प्रतीक है । प्रभु के बाण कालखण्ड - पल, क्षण, माह, वर्ष, युग आदि के प्रतीक हैं । इस तरह अखण्ड काल और बँटे हुए कालखण्ड दोनों के पीछे ही भगवान के कर-कमल विद्यमान हैं । जिसे वे ग्रहण करते हैं वह अचल और स्थिर है तथा जिसे वे प्रेरित करते हैं वह गतिशील काल है । पर वह काल भी अन्त में प्रभु के पास ही लौटकर आ जाता है । इसीलिए काल के संबंध में हमारी यह धारणा नहीं है कि वह वापस नहीं लौटता । भारतीय चिन्तन-पद्धति में काल को चक्राकार माना जाता है । दिन, वर्ष, युग सब क्रमशः आते-जाते रहते हैं । इसे हम विष्णु भगवान का चक्र कहें या भगवान राम के बाण के रूप में देखें दोनों ही रूपों में यह गतिशील काल निरन्तर लौटकर आता रहता है ।

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