गोस्वामीजी अपनी प्रशंसा और विरोध दोनों को समत्व में स्थिर रहकर तटस्थ भाव से देखते हैं । वे बड़ी सजगता से आत्मनिरीक्षण करते हैं और सूक्ष्मता से, गहराई से अपने आपको कसते रहते हैं । इस सन्दर्भ में महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में अहिंसा की जो परिभाषा की है, वही सूत्र, वही कसौटी गोस्वामीजी अपने संबंध में प्रयोग करते हुए दिखाई देते हैं । सामान्यतया यही कहा जाता है कि जो मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न दे, वह अहिंसक है । पर महर्षि पतंजलि अहिंसा को एक नया अर्थ देते हुए कहते हैं कि किसी व्यक्ति के जीवन में अहिंसा सिद्ध हो गई है इसका एक ही प्रमाणपत्र कि उसके पास जाने पर दूसरे व्यक्ति के मन के क्रोध आदि वैर-भाव पूरी तरह मिट जायँ । हम क्रोध न करें यह बात तो समझ में आती है, पर हमारे सामने आनेवाला व्यक्ति भी क्रोध न करे तब हमारी अहिंसावृत्ति पूरी है अन्यथा नहीं, यह तो अत्यंत कठिन कसौटी है । इसका तात्पर्य यही है कि हमारे जीवन में थोड़ा-सी अहिंसा की वृत्ति आ जाय तो हमें अपने अहिंसक होने का अभिमान हो जाता है । साधारणतया व्यक्ति इस कसौटी पर अपने आपको कस नहीं सकता । पर ऊँचे लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए ऐसी दृष्टि आवश्यक है ।
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