Wednesday, 20 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे । बाल्यावस्था में उन्होंने अभाव, भूख, उपेक्षा, अपमान आदि की पीड़ाएँ झेलीं । ऐसा अभागा बालक शायद ही कोई और मिले जिसे जन्म के तुरन्त बाद ही इतनी विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा हो । फिर गुरुदेव की कृपा से वे रामकथा श्रवण का अवसर प्राप्त करते हैं । इसके पश्चात उनके जीवन में एक लालसा विवाह के रूप में आती है पर इसके बाद उनकी मनोधारा, विचारधारा एक दूसरी दिशा में मुड़ जाती है । बाल्यावस्था में संस्कार के जो बीज गुरुदेव ने डाले थे, वे मानो एक काल विशेष में काम के आकर्षण के द्वारा ढक लिए गये थे, दब गये थे, पर वे नष्ट नहीं हुए । इसे गोस्वामीजी ने सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । वे कहते हैं कि बचपन में व्यक्ति यदि तैरना सीख लेता है तो फिर वह जीवनभर उसे भूल नहीं सकता । तैराकी सिखाने की बात कही जाय तो कहा जा सकता है कि इसकी क्या आवश्यकता है ? बच्चे को क्या तैराक बनना है ? बचपन में सीखने योग्य कई अन्य संस्कारों और बातों के विषय में लोगों का यही तर्क रहता है कि इसकी आवश्यकता नहीं है । जैसे हम यह सोचकर कि 'नित्य के जीवन में तैरने का कोई उपयोग नहीं है' तैरने का बचपन में अभ्यास नहीं करते, पर यदि बचपन में तैरना सीख लें तो भले ही वह प्रतिदिन उपयोगी न हो पर संकट काल में यह कला बड़ा लाभदायी सिद्ध हो सकती है, उसी तरह बाल्यावस्था में अच्छे संस्कार के बीज हमारे अन्तःकरण में डाल दिए जायँ तो अवसर आने पर वे उदित होकर हमारी सहायता कर सकते हैं, रक्षा कर सकते हैं । गोस्वामीजी के जीवन में हमें यही सत्य प्रतिफलित होते हुए दिखाई देता है ।

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