कई बार कहा जाता है कि आजकल इतनी कथा हो रही है, इतने लोगों के द्वारा प्रचार हो रहा है, पर उससे समाज को क्या लाभ हो रहा है ? इस सन्दर्भ में एक सज्जन के पास बड़े आँकड़े थे कि सारे देश में रामायण की कितनी प्रतियाँ छपीं, कितने विद्वानों ने शोध-प्रबन्ध लिखे, कितने आयोजन किये गये और उन आयोजनों पर कितना खर्च हुआ । उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में, इतने बड़े रूप में इन प्रयासों के बाद भी समाज का कोई लाभ तो दिखाई नहीं देता । मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक एक बात कही कि कोई व्यक्ति यह पता लगाए कि इस वर्ष देश में पाँच करोड़ या इससे भी अधिक संख्या में छाते बनाए गए और फिर इस आँकड़े के आधार पर कहने लगे कि इतनी बड़ी संख्या में छाते बनने से क्या लाभ, क्योंकि वर्षा तो रुकी नहीं । तो क्या आप इस बात को बहुत बुद्धिमतापूर्ण मानकर छातों का उपयोग और निर्माण बन्द कर देंगे ? कितनी भी संख्या में छाते बना लिए जायँ, वर्षा तो होती ही रहेगी । छाते की उपयोगिता वर्षा बन्द करना नहीं, एक सीमा तक आपको वर्षा से सुरक्षा प्रदान करना है । कथा के प्रचार-प्रसार और श्रवण से यदि हम यह आशा पाल लें कि इसके द्वारा समाज में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएगा तो शायद यह हमारी अतिरंजनापूर्ण धारणा होगी ।
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