गोस्वामीजी को बाल्यावस्था में किसी का स्नेह नहीं मिला, अतः जब विवाह हुआ तो स्वाभाविक था कि उनके ह्रदय का पूरा आकर्षण पत्नी के प्रति प्रगट हो । कुछ इस तरह कि जैसे एक व्यक्ति लम्बे समय तक भूखा रहने के बाद भूख की तीव्रता का अनुभव करता है । वे इसके प्रतिदान की आशा पत्नी से भी करते हैं । पर दोनों की स्थितियों में अन्तर है । पत्नी के पिता हैं, भाई है, आत्मीय और परिवार-जन हैं । उन सबके प्रति भी उनका कर्तव्य है । गोस्वामीजी चाहते हैं कि उनकी पत्नी अपना पूरा-पूरा स्नेह बस उन्हीं को दे । सत्य तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वही केन्द्र में रहे और अन्य सब उसके लिए ही सोचें, करें । इस तरह झगड़ा शुरु हो जाता है । प्रेम तो सब चाहते हैं, पर बँटवारा नहीं, पूरा चाहते हैं ।
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