Thursday, 7 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी को बाल्यावस्था में किसी का स्नेह नहीं मिला, अतः जब विवाह हुआ तो स्वाभाविक था कि उनके ह्रदय का पूरा आकर्षण पत्नी के प्रति प्रगट हो । कुछ इस तरह कि जैसे एक व्यक्ति लम्बे समय तक भूखा रहने के बाद भूख की तीव्रता का अनुभव करता है । वे इसके प्रतिदान की आशा पत्नी से भी करते हैं । पर दोनों की स्थितियों में अन्तर है । पत्नी के पिता हैं, भाई है, आत्मीय और परिवार-जन हैं । उन सबके प्रति भी उनका कर्तव्य है । गोस्वामीजी चाहते हैं कि उनकी पत्नी अपना पूरा-पूरा स्नेह बस उन्हीं को दे । सत्य तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वही केन्द्र में रहे और अन्य सब उसके लिए ही सोचें, करें । इस तरह झगड़ा शुरु हो जाता है । प्रेम तो सब चाहते हैं, पर बँटवारा नहीं, पूरा चाहते हैं ।

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