भगवान राम ने रावण के पास सन्देशवाहक राजदूत भेजने का विचार किया तो इस कार्य के लिए उन्होंने अंगदजी का चुनाव किया । पहली बार समुद्र के किनारे अंगदजी अकेले लंका जाने से सशंकित थे पर आज वे जरा भी सशंकित नहीं हैं । वे तो प्रभु के चरणों की कृपा के विश्वास से भरे हुए हैं । इतना ही नहीं, विश्वास की इससे बड़ी बात और क्या होगी कि रावण की भरी सभा में उन्होंने अपना पैर रोप दिया और यह प्रतिज्ञा कर दी कि रावण ! तुम या तुम्हारी सभा का कोई भी व्यक्ति मेरे पैर को उठा देगा तो मैं वचन देता हूँ कि भगवान राम लौट जाएँगे और मैं श्री सीताजी को हार जाऊँगा । बाद में बन्दरों ने अंगदजी से पूछा कि आपने इतना बड़ा दुस्साहस कैसे किया ? आपको जरा भी डर नहीं लगा । अंगदजी ने कहा कि क्या आप लोगों ने हनुमानजी की कथा नहीं सुनी थी जिसमें उन्होंने रावण से कहा था कि *राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।* - हनुमानजी जैसे भक्त प्रभु-चरणों के प्रभाव से जब रावण-जैसे व्यक्ति के राज्य अचल हो जाने की बात करते हैं, तो क्या प्रभु के स्मरण से मेरा पद अचल नहीं हो जायेगा । मानो हनुमानजी की कथा सुनकर अंगदजी में ऐसा प्रबल विश्वास उत्पन्न हो गया । इस प्रकार कथा के माध्यम से वे चरित्र, वे पात्र हमें कोई न कोई विचार, कोई-न-कोई प्रेरणा अवश्य प्रदान करते हैं । तुलसीदासजी के जीवन में भी ऐसा प्रभाव हमें दिखाई देता है ।
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