श्रीमद्भागवत पुराण में प्रसंग आता है कि परीक्षितजी को यह शाप दिया गया कि सात दिन में सर्प तुम्हें डसेगा और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी यह शाप परीक्षित को ही नहीं, संसार के समस्त लोगों को है । सात दिनों में ही तो कोई ऐसा दिन होगा जब काल डस लेगा । श्रीमद्भागवत सुनने का अर्थ यही है कि काल तो डसेगा ही पर सात दिन के रूप में यह जो दुर्लभ समय हमारे पास है, उस समय को हम भगवान की मंगलमयी कथा सुनकर धन्य बना लेते हैं । तब इससे हमारे जीवनकाल में ही मृत्यु का जो भय है वह छूट जाता है । परीक्षित अन्त में यही कहते हैं कि भागवत की कथा सुनकर मैं निश्चिंत और मृत्यु के भय से मुक्त हो गया हूँ । अब चाहे सर्प डस ले, शरीर न रहे पर आत्मतत्व के रूप में जो सत्य है वह कभी नष्ट नहीं होता । गोस्वामीजी अपने मन को इसी सत्य से साक्षात्कार करने की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि जो काल के दण्ड को धारण किए हुए हैं तू निरन्तर उनका आश्रय ले, काल के भय से छूटने का एकमात्र यही उपाय है ।
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