गोस्वामीजी से पूछा गया कि ज्ञान, वैराग्य और भक्ति में श्रेष्ठ कौन है ? उन्होंने कहा - भक्ति श्रेष्ठ है ! - क्यों श्रेष्ठ है ? उन्होंने एक बड़ी सुन्दर आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि माया और भक्ति दोनों ही नारी वर्ग में हैं, नारियाँ हैं । जब वे भक्ति को नारी कहते हैं, तो क्या उन्हें नारी-निन्दक मानने वाले यह मान लेंगे कि वे भक्ति के निन्दक हैं । वे कहते हैं कि ज्ञान और वैराग्य पुरुष होने के कारण माया के प्रलोभन में फँस सकते हैं, लेकिन भक्ति को प्राप्त कर लेने वाला कभी माया के मोह में नहीं फँस सकता, उस पर माया का रंचमात्र भी कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता ।
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