Tuesday, 19 September 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

एक बार एक गोष्ठी में गोस्वामीजी पर विचार प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि उनकी जितनी प्रशंसा की जाय वह अल्प है । पर उनकी प्रशंसा करने वालों के साथ-साथ उनके कटु आलोचक भी हैं जिन्होंने उनकी भर्त्सना भी की है । उनमें से कई नाम भी लिये गये । मुझे भी जब बोलने का अवसर मिला तो मैंने यही कहा कि आप लोगों ने जिन व्यक्तियों का नाम लिया है, उनमें से किसी ने गोस्वामीजी की उतनी आलोचना नहीं की है जितनी स्वयं गोस्वामीजी ने अपनी निन्दा की है । और विलक्षणता यह कि उनका यह आत्मनिरीक्षण, आत्मसम्मोहन से कोसों दूर है । आत्मकथा की परम्परा है । विशिष्ट व्यक्तियों की आत्मकथाओं के द्वारा लोगों को प्रेरणा मिलती है । पर यह सम्भावना भी बनी रहती है कि आत्मकथा, आत्मप्रशंसा का रूप न ले ले । व्यक्ति आत्मकथा में अपनी विशेषताओं, महानताओं का यदि वर्णन करने लगे तो इसका अर्थ है कि वह स्वयं पर मुग्ध है, आत्मसम्मोहन की स्थिति में है । गोस्वामीजी व्यामोह से सर्वथा मुक्त हैं ।

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